Sunday, December 21, 2008

बालू पर फसल उगाने की जद्दोजहद

मधेपुरा जिला मुख्यालय से 16 किमी पुरब है शंकरपुर प्रखंड. इसके रायधीर पंचायत में करीब डेढ़ महीने तक पानी रहा. ऊपरी इलाका होने के कारण पानी यहां ठहरा नहीं. रायधीर बसंतपुर के बीच मुरलीगंज ब्रांच कैनाल में बसंतपुर की ओर अब भी पानी लबालब भरा हुआ है. यहां 20 अगस्त को पानी पहुंचा, लेकिन ऊपरी इलाका होने के कारण रायधीर पंचायत में 27 अगस्त को पानी घुसा. हम बढते हैं कुमारखंड ब्लाक की ओर. इस पूरे इलाके में पिछले एक पखवाडे से सूरज नहीं उग रहा. खराब मौसम ने हमारी राह और दुरुह बना दी थी. पर हमारी यात्रा अनवरत जारी रही, शायद यहां के विकट हालात लगातार हमारी तकलीफों को कम कर देती. कुमारखंड ब्लाक के टेंगराहा परिहारी पंचायत के टेंगराहा गांव की हालत हमें दुर से देखने पर दूसरे गांवों से अच्छी लगी. यहां पानी निकल चुका था. किसान अपने खेतों में काम में लगे थे. हमें खुशी हुई कि चलो अगली फसल होने के बाद इनकी हालत सुधर जायेगी. लेकिन यहां के किसानों के चेहरे से चमक गायब थी. बाढ से लडने की थकान तो थी ही, अनिश्चित भविष्य की चिंता भी इनकी आंखों में साफ पढी जा सकती थी. नदी के किनारे होने के कारण खेतों में कम से कम चार इंच तक बालू भर गया है. इन्हें खेतों से निकाल पाना संभव नहीं दिखता और ऐसी हालत में बीज बोने के बाद फसल क्या होगी, यही चिंता किसानों को खायी जा रही. फिर भी किसान कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि इसके सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं. वे इन बालू भरे खेतों में गेहूं लगा रहे हैं. लेकिन हालत यह है कि गेहूं के छोटे छोटे पौधे की पत्तियां जल रहें हैं, भूरे पडते जा रहे हैं. इन किसानों को बीज तक के लिए कोई सरकारी मदद नहीं मिल रही. इस उम्मीद पर कि कुछ तो फसल होगी यह गेहूं की रोपनी तो कर रहे हैं, लेकिन हाइबि्रड बीज का इस्तेमाल इनके बस की बात नहीं. पटवन, सिंचाई की भी इन किसानों को कोई उम्मीद नहीं. खेतों को हुए नुकसान के मुआवजे के तौर पर 4000 रुपये प्रति हेक्टेयर का मुआवजा दिया गया यानी 1600 रुपये बीघा. बाढ में किसानों की खडी फसल तबाह हो गयी. अब उन्हें और फसल होने की उम्मीद नहीं, ऐसे में यह मुआवजा उनकी कितनी मदद कर सकता है, यह सोच पाना भी भयावह है. दूसरे के खेतों में काम करने वाले मजदूरों की दास्तानटेंगराहा गांव का सूरतलाल यादव अपने चार बच्चों के साथ खेतों में जी तोड मेहनत कर रहा था. पूछने पर पता चला कि यह उसकी अपनी जमीन नहीं. बाढ के पहले उसने किसी तरह पैसे जुगाड कर 8000 रुपये लीज पर यह खेत बटैया पर लिया था. बडे अरमान के साथ उसने अधिक पैदावार की उम्मीद में धान की हाइबि्रड बीज बोयी. खाद सहित कुल उसने इन खेतों पर 4500 रुपये खचर् कर डाले. लेकिन बाढ आयी और उसकी पूरी फसल डूब गयी. वह तबाह हो गया. उसे सरकारी मुआवजा भी नहीं मिल सकता, क्योंकि सरकारी नियमों के मुताबिक जमीन के मालिक को ही मुआवजा मिल सकेगा. और जमीन के मालिक उसके साथ जाना नहीं चाहते. वह किसी तरह अपने बालू भरे खेतों में फसल बोने की कोशिश कर अपना नुकसान कम करने की कोशिश तो कर रहा है, लेकिन यह बात भी वह अच्छी तरह जानता है कि यह कोशिश जल्द ही दम तोड देगी।

जिंदगी अब भी है बेपटरी

कटाव रोकने के लिए लोगों ने अपने घरों में बालू की बोरियां लगा रखी हैं.

बाढ का पानी उतरा, तो हर जगह एेसे कटाव बनते चले गये.

सरकारी राहत नहीं पहुंचते देख लोगों ने सामूहिक प्रयास कर बांस के खरपच्ची से पुल बना लिये हैं.


जानवरों की हड्डियों को बेचकर दो जून की रोटी जुटाने की जद्दोजहद जारी है.







तसवीरों के आइने में हाल ए बिहार

खेतों में अब भी जहां तक नजर जाती है पानी ही पानी नजर आता है.

सबकी आंखों में अब आंसू सूख गये हैं.

अब हर ओर यही नजारा देखने को मिलता है.





Friday, December 19, 2008

सौ साल के गंगोइ की बहादुरी

हिरोलवा गांव में हमारी मुलाकात सौ साल की उम्र पार कर चुके गंगोइ यादव से हुई. इनकी हड्डियां जरूर बूढी हो गयी हों पर हौसला नहीं. वे बताते हैं कि इस बार जब बाढ आयी, तो सभी दूसरी सुरक्षित जगहों पर चले गये. गांव में केवल 10 से 15 लोग रह गये. मैं भी रुक गया. बाढ से मुझे बिल्कुल डर नहीं लगा. वह बताते हैं कि वे अपनी जिंदगी में पहले भी इस तरह की बाढ देख चुके हैं, इसलिए यह बाढ उनके लिए एक सामान्य घटना की तरह ही थी. उन्होंने बताया कि कोसी पहले इसी ओर से बहा करती थी, उस समय 1934 के आसपास भयंकर बाढ आयी. उस समय नदी में घडियाल हुआ करता था, इसलिए डर अधिक लगता था. अब तो उसका भी डर नहीं है. मैंने गांव में रुककर सबके सामानों की देखभाल की. जिसके कारण आज लोग मेरे काम भी आ रहे हैं.

आंखों के सामने मर रहे हैं जानवर

हमने अपनी अगली यात्रा शंकरपुर ब्लाक के चिरुआ मधेली पंचायत से शुरू की. जगह बदलती जाती पर तसवीर वही रहती.इस पंचायत के हीरोलवा गांव में अभी तक जिंदगी पटरी पर नहीं आयी है. खेतों में ढाई से तीन फीट तक पानी अब भी भरा है. सबसे अधिक दुश्वारियां जानवरों के लिए है. ग्रामीण इलाकों के लिए पशुधन से बडा कुछ भी नहीं। आज वही धन यहां के लोंगों के हाथ से फिसलता जा रहा है. अकेले हीरोलवा गांव में 600 से 700 बकरियां मर चुकी हैं. गाय भैंस भी लगातार दम तोड रहे हैं. बाढ से सबसे अधिक नुकसान जानवरों को हुआ. बाढ के पानी में हजारों जानवर ग्रामीण और इंसान मर गये. उनके मरने से वह पानी विषैला हो गया. जो जानवर बचे, उन्हें वही पानी पीने को मजबूर होना पडा. विषैला पानी पीने से जानवर लगातार मरते रहे और ग्रामीण बेबस आंखों से उन्हें मरते हुए देखते रहे. उनके पास इसके सिवाय कुछ और रास्ता नहीं है. जो खुद अपनी प्यास बुझाने के लिए संघषर् कर रहे हों, वह अपने जानवरों के लिए पीने के पानी का इंतजाम कहां से करें। हिरोलवा के मात्र 10 से 15 फीसदी परिवारों के पास ही पिछले साल का अनाज बचा है. बाकी 80 फीसदी परिवारों को एक जून की रोटी के भी लाले हैं.
हीरोलवा से आगे बढने पर मधेली साइफन मिलता है. यहां नीचे से नदी ओर पुल से नहर गुजरती है. कोसी ने जब उफान मारा तो साइफन टूट गया. नहर और नदी एक हो गयी. जहां सूखा था, वहां 15 से 16 फुट पानी आ गया और तेज धारा बहने लगी. मोजमा में दो जगह नहर और एक जगह साइफन टूट गया. जिरवा नदी जो मौसमी नदी बन गयी थी, अब भरपूर नदी बन चुकी थी, इसकी धारा इतनी तेज हो चुकी थी, कि गांव के गांव इसमें समाते चले गये. मोजमा पंचायत में भी पानी भर गया. अब यहां से पानी उतर गया है. लेकिन अपने पीछे जानवरों की हड्डियों का ढेर छोड गया. इनमें सबसे ज्यादा बकरियां हैं।
रायफल ढूंढने के एक हजार
इस बीच, एक वाकिया हुआ जो ग्रामीण कभी नहीं भुलते. मौजमा हिरोलवा के बीच जो नहर टूटी थी, उसमें बीडीओ और सिपाहियों की नाव पलट गयी. सिपाही तो किसी तरह बाहर आ गये, लेकिन उनकी रायफल डूब गयी. वहीं घोषणा की गयी कि रायफल ढूंढने पर ग्रामीणों को एक हजार रुपये इनाम मिलेगा. ग्रामीणों ने काफी मशक्कत के बाद रायफल तो ढूंढ दी, लेकिन इनाम अभी तक नहीं.

Wednesday, December 17, 2008

घर मिला, पर जिंदगी नहीं

इस बात को चार महीने हो गये. अ।र्थिक मंदी और मुंबई पर हुए हमले ने सब कुछ भुला दिया. कोसी के कहर के मारे लाखों लोगों के अ।ंसूं, उनकी अ।ंखों में ही ठहरे हैं. अब उनकी सिसकियों को सुनने वाला कोई नहीं. हमने अपने अभियान की शुरुअ।त मधेपुरा से करीब 12 किमी दूर शंकरपुर ब्लाक के सोनवषार् पंचायत से की.इन चार महीनों में भले ही दुनिया में बहुत कुछ बदल गया हो, यहां के लोगों का ददर् वही है. वे अपने घरों को तो लौट अ।ये हैं, लेकिन उनकी जिंदगी नहीं बदली. उनके खेत खलिहानों में अब भी एक से ढाई फीट तक पानी जमा है. गांव की सडकें व घरों पर से तो पानी निकल गया है, लेकिन एक मुक्कमल जिंदगी जीने के लिए यह काफी नहीं. जहां तक नजरें जाती हैं, अब भी पानी ही दिखता है. खेतों में पानी जमा होने के कारण धान की फसल हुई नहीं, अगले कई माह तक किसी तरह की पैदावार हो सके, एेसा मुमिकन नहीं दिखता. बाढ के समय जो सरकारी सहायता मिली, दाना दाना गिनकर खचर् करने के बावजूद अब खाने के लाले हैं. सरकारी राहत के तौर पर गांव में हर परिवार को एक िक्वंटल चावल और 2250 रुपये नगद दिये गये थे. यह सहायता कम से कम तीन माह तक दी जानी थी, लेकिन एक बार जाने के बाद सरकारी हुक्मरानों ने दुबारा इस गांव का रुख नहीं किया. इस पंचायत के सात लोगों ने बाढ में अपनी जान गंवायी. प्रशासन ने उनके पिरवारों को एक एक लाख के मुआवजे की घोषणा तो कर दी, पर मिला सिफर् एक को. इस पंचायत के लोग थोडे से इस मामले में भाग्यशाली रहे कि कोसी तटबंध के टूटने के आठ दिनों बाद यहां पानी घुसा. इस बीच लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का मौका मिल गया. अपनी जिंदगी भर की गाढी कमाई को भगवान भरोसे छोड यहां के लोगों ने लालपुर हाइस्कूल में शरण ली. पानी बढा तो इन्हें सिंहेश्वर, लालपुर, हरदी, सहरसा के राहत कैंपों की ओर रुख करना पडा. करीब महीने भर बाद ये अपने घर लौटे और तब शुरू हुई फिर से जिंदगी शुरू करने की जद्दोजहद. वल्डर् विजन, राम कृष्ण मिशन, एपी कोडर् ने रिलीफ बांटी. लालपुर, सरोपट्टी, सिंहेश्वर अ।दि गांव के लोंगों ने यहां अ।कर राहत साम्रगी भी बांटी.पर इतना काफी नहीं है. इतनी बडी प्रभावित अ।ब।दी के लिए एक सक्षम मसीनरी का होना जरूरी है. वह सरकार के पास है. पर उसका उपयोग वह कर नहीं पा रही और बाढ पीडितों को उनके हाल पर छोड दिया गया

साइबेरियन पक्षियों ने किया रुख
एक विशाल भूभाग में पानी भर जाने से किसी और को फायदा हुअ। हो या नहीं, साइबेरियन पक्षियों को एक और शरणस्थली मिल गयी है. जो गिद्ध इस इलाके से विलुप्त हो चले थे, अब फिर से दिखने लगे हैं.

Tuesday, November 4, 2008

नई राह पर

राहत अभियान के खत्म होने का यह कतई अर्थ नहीं है कि हमारा अभियान खत्म हो गया। हमने इस आपदा के बाद इस इलाके का रूख सिर्फ राहत बांटने के लिए नहीं किया था। हमारा लक्ष्य था कि हम कोसी नदी की उस समस्या को समझे जिसके कारण दो सौ किमी की चौडाई में फैला एक बडा समाज सदियों से पीडित और उपेक्षित रहा है। इसी कडी में हमने एक नई राह चुनी है। वह है इस बार के सभी बाढ पीडित गांवों की यात्रा का अभियान। हमारी यह यात्रा वराह क्षेत्र से षुरू होगी, जहां से कोसी की सात धाराएं मिलकर एक होती है और अपने मैदानी भाग की यात्रा षुरू करती है। हम अपनी यात्रा कार्तिक पूणिZमा के दिन षुरू करना चाहते हैं, जिस दिन वहां भव्य मेला लगता है और पूरे इलाके के लोग पहुंचते हैं। वहां से षुरू होकर हमारी यात्रा कोसी की नई धारा से सटे सुपौल, मधेपुरा, खगडिया, भागलपुर से होते हुए कटिहार जिले के कुरसेला नामक स्थान तक पहुंचेगी, जहां कोसी नदी गंगा से मिलती है। फिर वहां से कोसी के दूसरे किनारे पर कटिहार, मधेपुरा और अररिया जिले के प्रभावित गांवों से गुजरते हुए नेपाल की सीमा तक जाएंगे। यात्रा के दूसरे चरण में हम तटबंध के भीतर के गांवों में जाएंगे, जहां इससे पहले कोसी नदी बहा करती थी। यात्रा के दौरान हमने करीब 100 प्रभावित पंचायतों में एक-एक रात गुजराने का फैसला किया है। इस तरह हमारी यह यात्रा सौ दिनों की होगी, जो लगातार न होकर अलग-अलग चरणों में समाप्त होगी। इस यात्रा का लक्ष्य आपदा के दौरान हुई जानमाल की क्षति का आकलन, आपदा और पिछले ढाई माह में चले सरकारी और गैरसरकारी राहत कार्य का दस्तावेजीकरण, इस घटना के बाद लोगों के जीवन में आए भौगोलिक, सामजिक और आर्थिक बदलाव का पता लगाना, कोसी समस्या के समाधान को लेकर लोगों की सोच का जायजा लेना और केंद्र सरकार की सीआरएफ नीतियों का प्रचार-प्रसार करना ताकि लोगों को उनका उचित मुआवजा मिल सके।

राहत अभियान समाप्ति की ओर

मित्रों कोसी पीडितों के बीच पांच सितंबर से चल रहा हमारा राहत अभियान अब समाप्ति की ओर है। करीब-करीब सारे पीडित अपने-अपने गांव जा चुके हैं और उनके गांवों में पंचायत की ओर से नियमित तौर पर प्रतिमाह दो िक्वंण् अनाज और कुछ धनराषि का वितरण किया जा रहा है। लिहाजा अब राहत सामग्री का वितरण लोगों को निकम्मा और लालची बनाने भर ही रह जाता। हालांकि हमने सोचा था कि नवंबर महीने में हम पीडितों के बीच भारी मात्रा में गर्म कपडे बांटेंगे, मगर इस अभियान के लिए हमें पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाया। ऐसे में इस अभियान को बंद कर देना ही उचित था। मगर अत्यंत अल्प साधनों में लगभग ढाई महीने चला सिझया समांग का यह अभियान हमारे लिए यादगार रहेगा। इस दौरान हमनें सुपौल जिले के प्रतापगंज ब्लाक के दस गांवों (दुअनियां, भवानीपुर, इस्लामपुर, भेडवा, हाडाबाद, अरराहा, ब्रहमोत्रा, सुरियारी, प्रतापगंज, टेकुनाद्ध में नियमित तौर पर राहत सामगि्रयों का वितरण किया और मधेपुरा के सिंहेष्वर प्रखंड से सटे हरिाराहा, रामपुर लाही, बरियाही, भथनी, परिहारी, जिरवा, टिकुलिया, रहटा और पटोरी गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के प्रयास किये। प्रतापगंज के गांवों में हमनें षुरूआत में दिल्ली की एक संस्था की मदद से राषन किट का वितरण किया और बाद में टेंट, बरतन, दवाइयां, कंबल, बाल्टी, मच्छरदानी, टार्च, साबुन, तेल इत्यादि सामगि्रयां भी उपलब्ध कराई। इन आंकडों के इतर प्रतापगंज में चले हमारे राहत अभियान की खासियत सामगि्रयों की मात्रा न होकर उसकी संचालन पद्धति रही। उन दिनों जब सारी संस्थाएं राहत षिविरों में रहकर काम कर रही थीं। हमनें पीडित गांवों में रहकर काम करने का फैसला किया। क्योंकि पहले दिन से हमारा लक्ष्य साफ था कि हमें राहत के रूप में खैरात नहीं बांटना है, बल्कि पीडितों को कुछ इस तरह मदद करना है ताकि वे संभल जाएं। जब अधिकांष राहत अभियानों ने लोगों को पंगु बनाने के अलावा कोई खास योगदान नहीं किया। अपने इसी लक्ष्य के कारण हमनें पीडित गांवों में बस कर लोगों से जुडने और उनके दुख दर्द को समझने की कोषिष की और फिर जिस इंसान को जैसी जरूरत हुई उसे वह उपलब्ध कराने की कोषिष की। अक्सर हम बातें भी किया करते थे कि अपने अभियान के तहत जो सामग्री हम सबसे अधिक बांटेंगे वह मीठे बोल होंगे। आज भी हम लोगों में से एक या दो लोग प्रतापगंज में ही रहते हैंं और उनका काम रोज सुबह गांव में टहलना और घर-घर जाकर लोगों से मिलना उनसे बातें करना होता है। इस दौरान हमें उनके घर में जिस चीज का अभाव नजर आता है और वह चीज अगर हमारे पास होती है तो हम उन्हें वह सामान उपलब्ध करा देते हैं। षुरूआत में जरूर हमनें कूपन बांटकर सामान बंटवाए पर बाद के दिनों में हमनें भीड लगाकर सामान बंटवाने का तरीका ही बंद कर दिया। क्योंकि यह तरीका लोगों के स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाला था।उसी तरह मधेपुरा के सिंहेष्वर प्रखंड के निकटवर्ती गांवों में चला हमारा अभियान भी कुछ खास ही था। यह इलाका बाढ से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में से था और हम चाहते थे कि यहां हम सघन अभियान चला सकें। मगर प्रतापगंज के लिए तो हमें राहत सामग्री मिल रही थी, इस इलाके लिए तमाम प्रयास के बावजूद हमें आष्वासन के सिवा कुछ भी नहीं मिला। ऐसे में भोपाल और धनबाद के मित्रों द्वारा भेजी गई दवाइयां काम आईं और हमनें इन इलाकों में मेडिकल कैंप चलाने की योजना बना डाली। हमारे पास डाक्टर नहीं थे, यह एक बडी समस्या थी। पर हमारे साथी पंकज और रूपेष ने इसका भी तोड निकाल लिया। उन्होंने डाक्टर फोर यू और यूथ फार इक्वलिटी के डाक्टर साथियों को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वे अपना अधिकांष समय इन इलाकों के लिए दें। हम इस बात के लिए आभारी हैं कि अपनी संस्थाओं की नाराजगी झेलते हुए भी उन्होंने खास तौर पर डाण् लोकेष और डाण् प्रियदषZ ने इन इलाकों के लिए पर्याप्त समय दिया। इस अभियान के दौरान खीची गई तस्वीरें काफी बेहतर हैं, जिन्हें मैं ब्लाग पर उपलब्ध कराने की कोषिष करूंगा।

Tuesday, October 7, 2008

कोसी की तकदीर लिखने से पहले

हम कोसीवासी फिर उसी तिराहे पर खडे हैं, जहां तकरीबन पचपन साल पहले थे। उन दिनों जोर-शोर से बहस हुआ करती थी कि आखिर इस उच्चश्र्रंखल नदी का क्या उपाय किया जाय। इसके कोप से उत्तर बिहार के लाखों बािशंदों को कैसे बचाया जाय। क्या बराज और तटबंध के जरिये कोसी को काबू में किया जा सकता है। या बराह क्षेत्र में प्रस्तावित हाई डैम ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है। या फिर जैसा कि पर्यावरणविद कहा करते हैं, इस चंचल नदी को यूं ही छोड दिया जाय और इसके कोप से तालमेल बिठाकर जीने की कोिशश की जाय।
हालांकि हमारी सरकार ने असफल बराज और तटबंधों के बीच इस शरारती नदी को फिर से कैद करने का फैसला ले लिया है, यह जानने के बावजूद कि बराज और तटबंध 25 साल पहले ही एक्सपायर हो चुके हैं। हमारे इलाके की अच्छी खासी आबादी, खास तौर पर वे लोग जिनके इलाके में इस बार कोसी ने तबाही मचाई है सरकार के इस फैसले से सहमत नजर आते हैं। उनकी नजर में बराज कभी एक्सपायर हुआ ही नहीं। यह भीषणतम हादसा इंजीनियरों-ठेकेदारों की लापरवाही और हठधर्मिता के कारण हुआ। दरअसल इन लोगों ने बराज बनने के बाद की 50 साल की नििश्चंता को जिया है। हालांकि इस दौरान भी कई बार तटबंध टूटे और भीषण बाढें भी आईं, पर नदी के रास्ता बदलने की खतरनाक अदा से मुक्ति मिल गई थी। मगर ये लोग इस नदी के साथ आने वाली सिल्ट की भीषण समस्या से या तो अनजान हैं या किसी सुपर नेचुरल सरकारी तुक्के से इसके समाधान की उम्मीद लगा बैठे हैं। जबकि इसी गाद के कारण कई सालों से बराज नाकाम पडा है और 9 लाख क्यूसेक तक का बहाव झेल चुका तटबंध इस बार डेढ-पौने दो लाख क्यूसेक दबाव नहीें बरदास्त कर पाया। इसके बावजूद अगर सिल्ट की सफाई कराये बगैर कोसी नदी को फिर से तटबंधों के बीच से इसी बराज के रास्ते गुजारने की कोिशश की गई तो हमें और हमारी सरकार को अगले साल फिर से ऐसी तबाही के लिए तैयार रहना होगा। अगर सरकार के पास सचमुच सिल्ट की सफाई की कोई योजना है तो इसे भी सबके सामने आना चाहिए। क्योंकि बराज के अंदर इतना सिल्ट जमा हो चुका है कि जेसीबी मशीन और गाडियों के जरिये इसकी सफाई में लंबा समय लग सकता है।
इस उधेडबुन वाली स्थिति में कई लोग परमानेंट साल्यूशन के नाम पर फिर से बराह क्षेत्र में प्रस्तावित हाई डैम की वकालत करने लगे हैं। यह डैम 60-65 साल से प्रस्तावित है, मगर इस पर काम शुरू नहीं किया जा सका क्योंकि यह परियोजना काफी महंगी थी। मगर कभी इस परियोजना को नकारा नहीं गया और इसकी तुलना में बराज को हमेशा तात्कालिक समाधान ही माना जाता रहा। बराज के निर्माण के वक्त भी सबसे आशावादी विशेषज्ञ ने भी इसकी उम्र 25 साल से अधिक नहीं आंकी थी। मगर उस वक्त जिन कारणों से हाई डैम परियोजना को स्थगित कर दिया गया था वे आज भी मौजूद हैं। आज की तारीख में इस परियोजना की लागत तकरीबन 1 लाख करोड है। कहा जा रहा है कि इस परियोजना से काफी बिजली बनेगी। जापान की एक वित्तीय ऐजेंसी इसमें पैसा लगाने के लिए भी तैयार है। मगर इस डैम से उत्पादित होने वाली बिजली भी काफी महंगी होगी। इसके अलावा बराह क्षेत्र भूकंप प्रभावित जोन में पडता है, ऐसे में अगर यह हाई डैम बन भी गया तो हमेशा एक भीषण आपदा का संकट मंडराता रहेगा और वह आपदा मौजूदा आपदा से कही बडी होगी। इस डैम के बारे में एक और दीगर तथ्य यह है कि आज की तारीख में अगर इसका निर्माण शुरू करवा भी दिया जाय तो इसे पूरा होने में लगभग बीस साल का समय लगेगा। लिहाजा इस परियोजना को स्वीकारने और नकारने के बीच बहस की लंबी गुंजाइश है।
अब बांध विरोधी पर्यावरणविदों का रास्ता यानि कोसी नदी के साथ सहजीवन का प्रयास। इन लोगों का मानना है कि नदी के सिल्ट लाने की क्षमता को नकारात्मक नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इस सिल्ट के जरिये भावी पीिढयों के लिए अच्छी जमीन का निर्माण हो रहा है। इन विशेषज्ञों की यह बात भी सच है कि अगर नदी को आजाद छोड दिया जाय तो कभी इतने बडे हादसे होंगे ही नहीं। मगर यह पूरी तरह सच नहीं कि अगर सालाना बाढ से तालमेल बिठाकर जीना सीख लिया जाय तो समस्या रहेगी ही नहीं। कोसी नदी की समस्या सिर्फ बाढ की नहीं है यह इसके बारबार रास्ता बदलने और इसके बाद जमीन को परती बना देने की भी है। हर 30-35 सालों में यह रास्ता बदल लेती है, जिसके कारण जानमाल की व्यापक क्षति होती है। हालांकि लोगों को अब याद नहीे पर 1930 के आसपास जब इसने रास्ता बदला था तो सुपौल का नाथनगर कस्बा पूरी तरह तबाह हो गया था। क्या नदी के साथ सहजीवन का अर्थ यह भी है कि हमें ऐसे हादसों के लिए तैयार रहना पडेगा। ऐसे में इन इलाकों में कोई पुल नहीं होगा, कोई सडक या रेल नहीं होगी, बिजली नहीं होगी, जैसा कि कोसी नदी के दोनों तटबंधों के बीच के गांवों में आज भी हो रहा है। इक्कीसवीं सदी के विकसित भारत में ऐसे हालात में जीना कौन चाहेगा ?
ऐसा नहीं कि हम इनमें से हर उपाय से पूरी तरह असहमत हैं। दरअसल अपने जीवन की कीमत पर हमें हर उपाय अधूरा ही लगता है। खास तौर पर उन हालातोें में जब सरकार हमसे पूछे बगैर हमारी किस्मत का फैसला कर चुकी है। हमारा सिर्फ इतना कहना है कि बहस होनी चाहिए, पीडितों की राय भी ली जानी चाहिए। ऐसे में याद आता है आजादी के बाद की बिहार सरकार का वह फैसला जिसके तहत कोसी की पूरी बाढ पीडित आबादी को झारखंड के रामगढ में बसाने की योजना बनी थी। आज हम इसे तुगलकी फरमान कहकर इस पर हंस सकते हैं, मगर इस योजना में कम से कम हमलोगों के प्रति सरकार की संवेदना तो झलकती थी। आजादी के बाद लगभग आठ साल बहस चलने के बाद बराज और तटबंध के निर्माण का फैसला लिया गया, मगर इस बार सक्षम लोगों की चुप्पी बहुत अखरने वाली है।

Wednesday, October 1, 2008

पहला दौर खत्म

कोसी की प्रलयंकारी बाढ के बाद सरकारी, गैरसरकारी संस्थाएं और आम लोगों द्वारा चलाए जा रहे बचाव और राहत कार्य का एक दौर अब समाप्ति की ओर है। बाढ के लगभग चालीस दिन बीच चुके हैं, इस दौरान आम लोगों के समूह, सेना के जवान, कुछ स्वयंसेवी संस्था, राजनीतिक दल और सरकार ने मिलकर जो काम किया है वह नििष्चत तौर पर अद्वितीय है। हालांकि इस बीच नाव के डूबने से, हैजा और डायरिया जैसी बीमारियों से, सांप काटने से और अन्य कई छोटी-बडी वजहों से बडी संख्या में लोगों ने जान गवाई है और गंवा रहे है। जबकि एक सक्षम प्रषासन इन मौतों पर जाहिर तौर पर काबू कर सकता था। क्योंकि एक बार आपदा सिर पर आ जाने के बाद हमें यह मालूम था कि यह सब हो सकता है। ये मौतें तटबंध के टूटने या नदी के धारा पलटने जैसी अप्रत्याषित घटना नहीं थी। मगर संभवत: इस आपदा के बाद कई दिनों तक प्रषासन खुद सदमें में रहा और ऐसा लगने लगा कि चीजें खुद बखुद उसके हाथ से निकलती जा रही है। इस बीच उसने मेगा कैंप लगाने जैसे कुछ असफल प्रयोग भी किए। मगर अंतत: प्रति परिवार एक िक्वंटल अनाज और 2250 रूपये नकद देने की उसकी योजना काफी सफल साबित हुई और खिचडी खिलाने की अधकचरी कोषिषों पर विराम लग गया। बहरहाल यहां मैं इस दौर में सरकार की सफलता-असफलता का जायजा लेने नहीं बल्कि इस पूरे दौर का विवरण देने की कोषिष में हूं। ताकि यह तय किया जा सके कि राहत और पुनर्वास का अगला दौर चलाया जाय या नहीं अगर चलाया जाए तो किस तरह।हर आपदा की तरह इस बार भी बचाव और राहत के इस दौर की बागडोर सबसे पहले स्थानीय लोगों ने थामी। बाढ का पानी तबाही मचाने के लिए जब गांवों में घुसने लगा तो लोग बदहवास हालत में स्थानीय कस्बों की ओर भागे। इस बार जिन इलाकों में पानी आया था वहां के लोगों ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी बाढ देखी ही नहीं थी और उनका सामना ऐसी बाढ से हुआ जो संभवत: कोसी नदी के जीवन की सबसे खतरनाक बाढ थी। प्रत्यक्षदषीZ बताते हैं कि पानी का रेला अक्सर आठ-आठ, दस-दस फुट का होता था और उसकी गति भी सौ किमी प्रतिघंटा के लगभग होती थी। ऐसे में वही लोग बच पाए जो या तो समय रहते उंचे स्थान पर चले गए या पानी देख सबकुछ छोडकर पूरब या पिष्चम दिषा की ओर भागे। पहले तीन-चार दिन तो बाढ किसी आतंक की तरह छाया रहा। पीिZडत इलाकों से बाहर निकलने वाले लोग न तो कुछ बोल पाते न ही ठीक से खा-पी या सो ही पाते। बडी संख्या में लोगों ने खुद को पागलपन के दौर से गुजरता हुआ पाया। हमारे साथी विनय तरूण को भागलपुर में एक ऐसा व्यक्ति मिला जो किसी उंचे पहाड पर जाना चाहता था। जबकि भागलपुर खुद बाढग्रस्त इलाके से 50-60 किमी दूर है। उस दौर में स्थानीय लोगों ने चंदाकर खानेपीने और लोगों को ठहराने का अभूतपूर्व काम किया। क्योंकि उस वक्त न तो सरकार सजग हुई थी और न ही संस्थाएं पहुंची थीं। सुपौल जिले के सिमराही कस्बे में हर आदमी चंदा देता और अपने घर से खाना भी लाता। लोगों ने बताया कि उस वक्त रिक्षावाले भी दिन भर की कमाई का आधा चंदे में देने लगे थे। प्रतापगंज ब्लाक के दुअनियां गांव के राजकिषोर भगत नामक एक दुकानदार ने अपने पैसे से पंद्रह दिनों तक लोगों को चाय, सत्तू और पानी पिलाया। मेरी जानकारी में ये दो उदाहरण हैं मगर ऐसे न जाने कितने प्रयास हुए उसका कोई लेखाजोखा नहीं है। मगर इस में कोई मतभेद नहीं है कि कोसी की चपेट में जो लोग नहीं आए वे भूख और बदहवासी से मर जाते अगर स्थानीय लोगों ने उन्हें सहारा नहीं दिया होता। इस लिए मेरे हिसाब से इस दौर के सरताज यही लोग हैं। दूसरा नंबर मैं सेना के जवानों को दूंगा जिन्होंने उफनती कोसी की लहरों की सवारी करने का जोखिम उठाया और छतों, छप्परों, नहरों और अन्य जगहों पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे लोगों को बचाकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। जो लोग अपने घरों को छोडने के लिए तैयार नहीं थे उनतक राहत और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाई और तब तक डटे रहे जबतक पानी काबू में नहीं आने लगा। जैसा कि मैं पहले ही जिक्र कर चुका हूं, स्थानीय प्रषासन लगभग एक महीने तक सदमें की स्थिति में रहा और इस बीच में उसने जो कुछ किया उसका कोई असर नहीं रहा। स्थानीय लोगों की पहले भी लगभग दस दिन के बाद दम तोडने लगी थी। इस बीच करीब बीस दिनों तक मोरचा स्वयंसेवी संस्थाओं और फंडिंग एजेंसियों ने संभाला। नहरों-सडकों और स्कूलों-कालेजों में फैले बाढ पीडितों के लिए खाना उपलब्ध कराया। उन्हें टेंट, अनाज, कपडे, बरतन, साफ पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य जरूरी चीजें उपलब्ध कराईं। जारी

Tuesday, September 23, 2008

बेहिसाब मौतों की अनकही दास्तां

हादसों की भीषणता का अहसास हम हमेशा से मरने वालों की संख्या जानकर चलाते रहे हैं। गुजरात भूकंप में जब मरने वालों का आंकडा 25 हजार पार करने लगा तो पूरा देश दहल उठा। सुनामी के दौरान पहली बार मृतकों की संख्या लाख के पार चली गई, फिर म्यांमार में तो सारे आंकडे ही पीछे छूट गए। मगर क्या आपको मालूम है कि कोसी की धार पलटने से कितने लोग अकाल काल के गाल में समा गए । हादसे के एक माह बीत जाने के बावजूद कोई यह सही-सही बताते की स्थिति में नहीं है। रोज नावें पलट रही हैं और हैजा-डायरिया से लोग पटपटा-पटपटाकर मर रहे हैं पर सरकारी आंकडा सौ के पार नहीं गया। ( नाव पलटने और बीमारी से मरने वालों को सरकार बाढ से हुई मौतों के खाते में नहीं रखती, उनके मुताबिक यह सब तो हादसे हैं। बहुत संभव है कि जब मृतकों को मुआवजा बटने की बात उठे तो ये लोग सरकारी सूची से बाहर हों। मगर जब आप सुपौल, सहरसा, मधेपुरा के किसी चाय की दुकान पर दस हजार मौतों की बात भी कहेंगे तो लोग आपसे झगड बैठेंगे। स्थानीय लोगों के मुताबिक किसी भी हालत में यह आंकडा लाख से कम नहीं। उनके अपने तर्क हैं। कोसी की धार में आने वाले सुपौल जिले के बसंतपुर प्रखंड के बलभद्रपुर, नाढी, कुषहर, पटेरवा, बेरिया कमाल आदि गांवों के लोग किसी कैंप में नजर नहीं आते। इन गांवों में बहुत कम लोगों के बचने की उम्मीद है, क्योंकि बांध टूटने के बाद सबसे पहले पानी इन्हीं गांवों में घुसा। जब पानी इन गांवों तक पहुंचा तो लोगों को खबर तक नहीं हो पाई थी कि बांध टूट गया है। लगभग सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से करीब पंद्रह फुट उंची लहर आई थी, ऐसे में जो बचा वह संयोग से ही बचा होगा। छातापुर ब्लाक में जब पानी पहुंचा तो लोगों को खबर हो चुकी थी कि पानी आ रहा है, मगर इन इलाकों में कभी बाढ आई नहीं थी सो कई गांवों के लोग यह मानकर चल रहे थे कि इधर पानी आने का कोई तुक ही नहीं है। इस गलतफहमी में हजारों लोगों की जान ले ली। बलुआ, परियाही, राजाबारा, तिलाठी, भगवानपुर आदि ऐसे ही कुछ गांवों के नाम हैं। बलुआ की तो लगभग एक चौथाई आबादी के काल कलवित होने की आशंका जताई जा रही है। इसके बाद मधेपुरा के कुमारखंड प्रखंड का नंबर आया। सुपौल जिले में जहां कोसी नदी तीन अलग-अलग धारों गेडा, मिरचैया और सुरसर से निकली थी वहीं कुमारखंड में तीनों धार मिलकर एक हो गई और जिधर से निकली सबकुछ बहाती हुई निकली। इस धार का रास्ता कुमारखंड होकर ही था। लोग बताते हैं कि कई दिनों तक कुमारखंड में लोगों की पहली मंजिल के उपर से पानी बहता रहा। कोसी जैसे पिछडे इलाके में जहां अधिकांष लोग फूस के घरों में रहते हों वहां कोसी का यह जलवा क्या कहर बरपाया होगा यह सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। कोसी की लहरों के कहर को देखना हो तो इन दिनों देखें। बाढ का पानी उतरने के बाद कोसी अपना रास्ता दुरूस्त करने की कोषिष में मचल रही है। स्थानीय लोग बताते हैं कटनियां तो अब हो रहा है। नदी अपनी धारा के दोनो तरफ की जमीन को काट-काटकर अपने मार्ग को पुख्ता बना रही है। इस कटनियां में बडी संख्या में लोगों के घर समा रहे हैं। जब नदी का गुस्सा ठंडा होगा तो कई लोगों को यह भी पता नहीं चल पाएगा कि उनका गांव कहां हुआ करता था। मगर इन सारी बातों की फिक्र करने वाला कौन है। यह तो बेहिसाब मौतों की अनकही दास्तां है।

Friday, September 19, 2008

आप बदल सकते हैं इनकी किस्मत

जिस वक्त आप अपने घर में कंक्रीट की छत के नीचे सुकून भरी ज़िन्दगी का लुत्फ उठा रहे हैं, कोसी अंचल के लाखों लोग शिविरों में, सडक व नहर के किनारे बसी झुग्गियों में और कोसी की अविरल धारा के बीच फंसे अपने मकान की छत पर बैठे सबकुछ बर्बाद हो जाने की हकीकत से तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं।
इन्हें नहीं मालूम कि वह दिन कब आएगा जब फिर से इनके सिर पर छत और पैरों तले जमीन होगी? सरकारी व गैरसरकारी शिविरों में मिलने वाला भोजन कब तक नसीब होगा? दो महीने बाद आ धमकने वाली कंपकंपाती दिन-रातों से कैसे मुकाबला करेंगे? कितने महीनों बाद इनकी खेतों में फसल उगाई जा सकेंगी? बंद पडी दुकानों के ताले कब खुलेंगे? कितने दिनों में हालात बदलेंगे और इन्हें लोग मजदूरी के लिए बुलाने लगेंगे? बाढ़ में बह गए या खो गए इनके पालतू पशुओं का क्या हुआ होगा? इनके हंसुओं, कुल्हाडियों, कुदालों और हल के फाल की धार कब तेज होगी? इनके उस्तरे कब चमकेंगे, कब इनके चाक पर घडे घुमेंगे? इनकी सिलाई मशीन, इनकी धौंकनी, हथकरघे, भटिठयां सब कुछ सपना बनकर रह गया।
पढाई-लिखाई की उम्र वाले बच्चे दिन भर रिलीफ बांटने वाली गाडियों के पीछे भागते रहते है. कोई काम न होने के कारण महिलाएं आपस में झगडती रहती हैं और मर्द इस कोशिश में जुटे रहते हैं कि कहीं से कुछ रिलीफ मिल जाए और ज़िंदगी के दिन कुछ और बढ जाएं। यानी ज़िंदगी ठप है और दिन गुजर रहे हैं।
मगर क्या इन्हें ऐसे ही छोडा जा सकता है? क्या 40 लाख की हताश आबादी को इस दुष्चक्र से बाहर निकालने का कोई रास्ता नहीं? क्या यह आपकी भी जिम्मेवारी नहीं? आप, जिनके घरों के आसपास से कोसी की धारा नहीं बह निकली, जिनके इलाके में कभी भूकंप नहीं आया, कभी सुनामी की तेज लहरों ने आपकी छत न उडा दी, क्या यह आपकी जिम्मेवारी नहीं है, जबकि आपके सिर पर छत है और एक नौकरी, एक व्यवसाय या अच्छी खासी जायदाद है?
आपकी छोटी सी कोशिश एक परिवार को इस दुष्चक्र से बाहर निकाल सकती है। आपके पांच हजार रूपयों के सहयोग से एक घर घर बन सकता है। चार पांच महीने बाद दुअनिया का सिताबी यादव मुस्कुराकर कह सकता है, धन्यवाद सिंहाजी। हो सकता है वह अगले साल ही पांच हजार रूप्ये लेकर आपके दरवाजे पर हाजिर हो जाए।
मगर आज यह एक सपना है। कोसी अंचल के हर पीडित का सपना। कोसी पुनिर्नमाण अभियान का सपना। इस अंचल की एक छोटी सी संस्था सझिया समांग ने यह असंभव सा लगने वाला सपना देखा है। इसके स्वयंसेवक फिलहाल सुपौल जिले के प्रतापगंज ब्लाक के कुछ गांवों में इसी कोशिश में जुटे हैं। मगर काम बहुत बडा है और संसाधन बहुत कम।
हमें मालूम है कि हमारी पहचान बहुत छोटी है और न मालूम हमारी इस अपील पर कितने लोग ऐतबार करेंगे। फिर भी हम यह अपील जारी कर रहे हैं ताकि बाद में यह न लगे कि हमने कोशिश ही नहीं की। और अगर एक भी इंसान हम पर भरोसा कर सकेगा तो कम से कम एक घर तो बस ही जाएगा।
अगर आप हमपर भरोसा करने वालों में से एक हैं तो इस पते पर मेल करें। sajhiasamang@gmail.com

Tuesday, September 16, 2008

APPEAL FOR CONTRIBUTION & DONATION

Friends,
What happened in Bihar in last 27 days is not flood; it is disaster at very large scale. Many announcements of support been done but situation is not improving. It needed lots of effort from all directions. What we are trying to do is very small effort and it is your support at all fronts which energies us to do it in better way. So, it is my appeal to all of you for contribution & donation to the organisation.

You people can give support dirctly to SAJHIA SAMANG on account number given below:

Account Number- 4470 101 000 19229
Bank of India, Saharsa
Postal Address of Sajhia Samang
H/o Mr. A. K. Mishra
Near Maharana Pratap Chawk
Gautamnagar, Gangjala
Saharsa-852201
E mail: sajhiasamang@gmail.com

Saturday, September 13, 2008

एक स्‍वागत योग्‍य पहल

साथियों,
हम यहां एक ई पत्र दे रहे हैं, जो कि भारत ज्ञान विज्ञान समिति की ओर से जाने माने समाज विज्ञानी एवं शिक्षाविद विनोद रैना ने अपने मित्रों को भेजा है। बिहार बाढ आपदा से निपटने के लिए यह एक दीर्घकालिक और सुनियोजित रणनीति है, जिसका स्‍वागत होना चाहिए, इससे आपको जुडना चाहिए और ऐसा करने के लिए दूसरों को प्रेरित करना चाहिए।

Dear Friends,
After a somewhat spontaneous and unorganised response to the devastating Bihar floods by BGVS activists residing in the affected districts (many of them being victims themselves), BGVS has now geared itself to work through 7 organised camps, as per the enclosed plan.
The cost for each camp is estimated to be around 400,000 rupees for two months. As a matter of policy, BGVS does not accept funds that invoke FCRA clearance and conditionalities. However any kind of donation from within the country (India) accounts would be most welcome. Please also circulate this amongst such individuals and networks that you know. Any such donations, in the name of 'Bharat Gyan Vigyan Samiti' may please be sent to:
BGVS
YWA Hostel No. 2
G-Block, Saket
New Delhi 110 017
The accounts of such funds shall be maintained in a separate 'Bihar Flood relief Account', which will be audited and made public as soon as the efforts are over.

In solidarity,
Vinod Raina
vinodraina@gmail.com
Please also contact the BGVS General Secretary: Asha Mishra at "asha mishra" asham_200@yahoo.com


BHARAT GYAN VIGYAN SAMITI

A PROGRAM FOR THE FLOOD AFFECTED PEOPLE OF BIHAR

BGVS Bihar is active in all the seven flood affected districts, having better organizational strength in three districts, namely, Madhepura, Saharsa and Supaul. BGVS activists started work in these districts from the very first day; mobilizing food and other resources from the community. It also set up three relief camps in Saharsa district. Governmental efforts for relief and rescue appear feeble and inadequate as of now and need to be augmented. The condition of the affected people continues to be extremely distressing. The immediate need is to rescue people; otherwise their lives will be lost. The responsibility of a grassroots organization like BGVS is to help the people. After assessing the needs of the people and its organizational strength, BGVS has decided to continue its work in 11 blocks of 3 districts of Bihar.

Objective

  • To provide immediate relief by providing food, clothes and water.

  • To provide proper health and sanitation facilities.

  • To provide relief from trauma by involving the people in creative activities.

Strategy

The strategy is to run 7 camps in 11 blocks of 3 flood affected districts. In each camp around 300 families or an average of 1000 people will get relief.

In each camp, 15 full-time activists will undertake the tasks. Along with support resource persons, about 150 full-timers will work in these camps for two months. A coordination office will be established in Saharsa district from where all the efforts will be facilitated and monitored.

The Area

BGVS will cover the following areas in the next two months:

S.No

District

Block

Camp Point

1

Madhepura

1. Madhepura

2. Muraliganj

3. Kumarkhand

4. Shankarpur

5. Singheshwar


1. Budhma



2. Baishardh

3. Shankarpur

2

Saharsa

1. Saurbazar

2. Patarghat

3. Sonbarsa


4. Patharghat

5. Manori

3

Supaul

1. Chhatapur

2. Triveniganj

3. Pratapganj

6. Chhatapur

7. Pratapganj

The Structure

- Formation of a 7 member of state level coordination committee

- Formation of 11 member district level coordination committee in 7 districts

- Formation of 21 member of Camp level coordination committee in 7 Camps

The programme

i. Provide proper food and accommodation

BGVS will construct temporary structures for 250-300 people at each camp. Each camp will have two tents, one for males and another for females. Apart from this, two activity halls and one kitchen will be constructed. The camps will be established in nearby schools, BDO office or community centre, where one cloak will be established to keep the belongings of the people safely.

ii. Organisation of Health Camps

In each camp health camps will be organized for the whole month. Doctors will be mobilized from BGVS units in other states. A team of 3-4 doctor's will remain for 10 days in each camp, providing proper treatment and medical facilities to the people.

iii. Creative activities

The presence of people in these camps provides an opportunity for many activities, which will also keep the people engaged. Some of these activities could be:

a. Activities for children like Balmelas, children books, etc.

b. Janvachan, of interesting books

c. Video and Film Shows

d. Literacy Classes

e. Celebration of festivals and other days.

f. SAMTA Mela (Women's Mela)

Friday, September 12, 2008

Bhairab slipped in the stream with bike

One of the board members of the organizatin & Coordinator Bhairabanand Jha yasterday slipped with his motorcycle in the stream of Koshi. Stream was fast but it is not too deep. With the help of people he saves himself. This is a place where koshi destroyed east west corridor and this cut has flowing water. This is the place just before Duania.

Pushyamitra residing at unreachable village

Our friend Pushyamitra decided to stay in the affected village without having any fasility. He is very logical about his decision, he said, untill anyone will not stay in the village all need assesment is estimated and that will not make victim satisfied, so he just want to go through the experince of it. He eats in the village; stay at in the village from 10th September’2008. On 11th Rupesh, Bhairab & Shanu joined him.

Wednesday, September 10, 2008

. . . Our Long Term Initiative Starts Today

We strated our initiatves just after 24 hours of breach on evening of 19th augast, Running through all the affected areas up to Kusaha(Nepal) taken 4 days. But, that was the process of understanding the disaster, which resulting into initiatives. Small initiatives were for temporary rilief, but now with the support of friends we are in the position to start some initiatives for long term.
We have a plan to work in 5 most affected areas. Today we are starting survey at self evolved camp of Duania Canal. On the basis of survey we will distribute relief & organise medical camp. During all these work we will do assesment to strat our initiatives for livelihood & advocasy for compensation as per Calamities Relief Fund(CRF). We plan to work with the active paricipation of community. Group at the village level will work as pressure group & this group will aware community about CRF norms. We are going to print 5000 copies of summary of CRF norms in one page. Advocasy & Livelihood intiatives demands patient support at all front so we plan it in long term.
Our 25 volunteers are supporting Bihar Rural Livelihood Projects for surveying lost & found victims at 71 governmental & uncountable community camps of Madhepura district.
With the support of OXFAM, our ten vounteers are working to avail temporary relief & medical need of victims.

Monday, September 8, 2008

Kosi Floods: Establishment Refuses To Learn Any Lesson

Dr. Jagannath Mishra, former Chief Minister of Bihar, has given a pathetic description of floods in Bihar. He said that "Nobody from the government has gone to Saharsa so far. If the people in Saharsa are surviving, they must be saying that we are engulfed in water since ten days and nobody is there to think about us. This is quite worrisome. I will suggest that we must try to look after those surviving there. We must try to save them, whether by boats or a helicopter….. The flood in Saharsa is not a flood, this is unprecedented….we cannot call it a flood, it is a deluge." But wait, he is not talking about the recent floods (2008) in Bihar. He was making a speech in the Bihar Vidhan Sabha on the 13th September 1984 about a similar incident that took place on the 5th September 1984 near Navhatta in Saharsa district of north Bihar when the Kosi had breached its embankment at 75th kilometer south of the much talked about Bhimnagar Barrage and come out of the jacket just as it happened at Kusaha this year. Obviously, the powers that be refuse to take any lessons from the past mistakes and their executive wing, the Water Resources Department, is immune to any criticism and learning. The 1984 incident had uprooted nearly half a million people from their homes and hearths and engulfed 96 villages spread over 7 blocks of Saharsa and Supaul districts then. They could return to their homes only after the Holi festival in March 1985.

The Kosi embankment (locally called as the eastern afflux bundh was breached near the Kusaha village in Nepal turning four Panchayats of Nepal into a watery grave. These Panchayats are Western Kusaha, Sripur, Haripur and Laukahi with a population of nearly 35,000. Counting continues about the number of villages trapped in floodwaters in Bihar. Supaul, Saharsa, Araria, Purnea, Katihar, and Khagaria had to bear the brunt of the unexpected floods. According to official sources nearly 35 lakh people have been hit by the floods in these districts. Nearly 3 lakh people have been evacuated from the engulfed areas. Relief operations are reported to be picking up for the survivors and so are the rescue operations. Unless marooned people are accessed, relief operations carry little meaning. The relief that is reaching the people is not adequate as they were braving the floods for about a fortnight without any external assistance.
The blame game and mud slinging that is so common to such accidents are also going on in full swing. Many leaders of opposition have blamed the Govt. of Bihar for the breach while the GoB and its ministers are calling the breach a natural calamity and that the river is now trying to go to the east. It must be mentioned here that that the Kosi embankments have breached thrice on its western side and each time it was suggested that the river is trying to the west. The Kosi embankments were built in late 1950s and according to the agreement with Nepal, the responsibility of maintaining these embankments was vested in GoB. Let us glance through the earlier breaches in the Kosi embankment.

The inaugural breach had to be faced on the western embankment in Nepal in 1963 near the village Dalwa. Binodanand Jha of the Congress Party was the chief minister and the responsibility of the breach was passed on to rats and foxes that dig holes in the body of the embankments through which water seeps and the embankment fails. The other reason for the failure was given that because of the bad road conditions, the boulders could not be reached to the site. In this connection, a meeting of the Irrigation Minister of Bihar, Dip Narayan Singh, the Panchayat Minister of Nepal, Kharag Bahadur Singh and the Irrigation Minister of Nepal, Dr. Nageshwar Prasad Singh was held at the Kosi Project headquarters at Birpur on August 22, 1963. The Nepalese side offered to extend all cooperation in undertaking any long term programme to tame the Kosi. They also indicated that should a need arise for rehabilitation of the people in a similar situation, then its responsibility should be taken by the Government of India. Then came the breach of 1968 at five places in Jamalpur (Darbhanga). This was caused due to the highest flow of 913,000 cusecs ever recorded in the river but an enquiry held by the Chief Engineer – Floods of CWC, P N Kumra revealed that the failure was once again caused by the rats and foxes. The state was under the President's Rule then.

The residents of eight villages in the Basantpur block of Supaul district had refused to be relocated outside the Kosi embankment and demanded instead a ring bundh for them and the eastern Kosi embankment formed a part of this ring. The Bhatania Approach Bundh that was constructed in 1968-69, collapsed between 10th to 19th kilometer below Bhimnagar in 1971 and many villages were washed away but eastern embankment had not breached. The Approach Bundh was constructed at a cost of Rs. 3.17 lakhs but the repair cost of the same was to the tune of Rs. 2.87cr.The state was under the Chief Minister ship of Bhola Paswan Shastri of Sanyukt Vidhayak Dal. Since the damage was done only to eight villages, the incident did not get wide publicity.

The next incident occurred in 1980 near Bahuarawa on the eastern embankment in Salkhua block of Saharsa district near 121st kilometer below Bhimnagar. The river eroded the embankment in about 2 kilometers reach but just after eroding, it receded very fast and did not spill on to the countryside. The state was ruled by Dr Jagannath Mishra of Congress Party then. In 1984, a tragedy as bad as Jamalpur struck the eastern embankment near Hempur village in the Navhatta block of Saharsa district, 75 kilometer below the Bhimnagar barrage. It had uprooted half a million people and had engulfed 96 villages in 7 blocks of Saharsa and Supaul districts. People could go back to their villages only after the Holi festival of 1985 when the breach got plugged. The breach was repaired at a cost of Rs. 8.2cr. Bindeshwari Dubey of Congress Party was the Chief Minister.

In 1991, there was a breach in the western embankment near Joginia in Nepal that led to a political crisis in Bihar and the Water Resources Minister of the state had to resign his post. This resignation was never accepted by Lalu Prasad Yadav who was the Chief Minister of the state then. This was a repeat performance of Bahuarawa breach where the river had receded after eroding the embankment. The repair of the embankment costed Rs 5.17cr and a compensation of Rs. 19.80 lakh had to be paid to Nepal for temporary acquisition of the land and trees etc.

And the Kusaha breach took place in the regime of Nitish Kumar and it will take about a year to get the complete story. Thus, virtually no party including the President's Rule can claim that it was not involved in such an accident. Yet, the blame game and mud slinging continues unabated. There is no history of these breaches being plugged before March next year. The practicality of embanking of a heavily silt carrying river is that the embankments would breach at regular intervals as we have seen so far that the river has breached its embankment 8 times in a span of just 50 years. The government will keep on raising and strengthening these embankments and they would retaliate in a more ferocious way. This will happen irrespective of which party is ruling the state and also in full presence of administration, officials of the water resources department and the police.

An interesting argument is given by the engineers and politicians after blaming Nepal and Nepali people of non-cooperation that the river has changed its course and it now wants to move to east. If that is true, why on earth the embankments were constructed along the river? Were they not meant to prevent the river from moving either east or west? How did the Water Resources Department know that the river wanted to change its course? Why did it help the river accomplishing its objectives? All this can happen in our country because there is no accountability at any level. Remember the World Commissioned of Dams Report (2000) which was rubbished by Government of India and it laid too much of emphasis on accountability as one of its primary tools.
All this bickering notwithstanding, the people of Bihar need help from outside. Be it Governmental or otherwise. For those who have lost everything that they possessed, the life will have to start from scratch. We used to suggest earlier that people should get compensation instead of relief but will say this year that they should not only get compensation but relief also. This could be any kind to rehabilitate them back in their life. The worst is yet to come when the water would recede and the people will get to know how much of their land is sand cast, how much has gone under waterlogging. That is the time they will come to know that the Kharif is already lost and the chances of Rabi also may not be there as moisture of the land will not allow for ploughing operations and without ploughing no agriculture will be possible. The order is going to be tall. Kosi floods this year have been disastrous and no explanation whatsoever would satisfy the hapless victim of the tragedy that will be remembered for a long time to come.
One is reminded of a statement of Karpoori Thakur, a former Chief Minister of Bihar, in Bihar Vidhan Sabha during the zero hour, "I am pained to say that after reminding the officers time and again, this small repair work of the embankment was not done. The result is that the embankment has breached between 75 to 78 km and almost all of Saharsa district is under a sheet of water. The situation is horrifying there and the district administration or the engineers of the Irrigation Department have not done what they should have done in the situation. Rome was burning and Nero was playing his flute and this is what this Government is doing." This again was a statement on the 10th September 198. Has anything changed ever since?

Dinesh Kumar Mishra
Convenor-Barh Mukti Abhiyan
6-B Rajiv Nagar, Patna 800024
E-mail: dkmishra108@gmail.com
Mob: +919431303360

कोसी क्षेत्र का पुनर्निर्माण

विनय तरुण भागलपुर में हैं. बाढ राहत शिविरों में. मदद के लिए उठे आपके हाथों ने उन्हें हौसला दिया और वहां सभी साथी दोगुने उत्साह से हांफती सांसों को थामने में लग गए हैं. उन्होंने हालिया तस्वीर को अपनी चिट्ठी में बताया है. वे बताते हैं कि हालात अभी बदतर हैं और अभी और भी बिगडेंगे. जितना किया जा रहा है वह नाकाफी है. दरकार और हासिल के बीच लंबा फासला है. सुबह उठते लोग टकटकी लगाए आसमान की ओर देखते हैं. पूरी चिट्ठी पढने के लिए नीचे यहां क्लिक करें.

जिसने छीना है कइयों का ठौर

मोहित कुमार पांडेय भोपाल में पत्रकारिता की पढाई कर रहे हैं. बिहार में बाढ की खबरें पढते, सुनते और देखते हुए वे बेचैन हैं. उन्होंने बाढ को करीब से देखा है और पानी होते जीवन में कई बार मौत से आंखें मिलाई हैं. उनका दर्द इस कविता में जाहिर होता है.


सुना था जल ही जीवन है,
पर बिहार में जल ही जल था,
जीवन के लिए त्राहि-त्राहि थी।
एक छत पर लेटा आदमी सपना देख रहा था,
कि उसके जीवन में खुशियों की बाढ़ आ गई।
परन्तु कोसी की बाढ़ ने आज उसकी आड़ तक ले ली।
अब उसके घर में बची है, उसकी बच्ची अकेली।
बच्ची पांच साल की है, वह तो पानी से खेलती थी।
परन्तु वह क्या जाने , कि इस पानी ने क्या खेला।
इस पानी की खातिर उसके परिवार और बिहार ने क्या झेला।
उसकी जुबां पर तो सिर्फ मां-मां है।
पर ये तो किसी को नहीं पता, कि पानी के इस भीषण बहाव में, उसकी मां कहां है।
लो अब बचाव वाले खाना ले आये।
खाने के लिए भगदड़ मची,
और बेचारी बच्ची उसमें फंसी।
कहीं से एक दाना पाकर, वह खाने के लिए ढूंढ रही है मां के हाथों को ।
पर जैसे ही पानी में हाथ डालती है,
वह पाती है बड़े-बड़े सांपों को ।
हे पानी ये तू है या कोई और,
जिसने छीना है कइयों का ठौर।
अब क्या बचा, एक बूढ़ी मां चिल्ला रही है।
अब तो उसकी प्यारी गाय भी, पानी में बहती जा रही है।
बड़े-बड़े जहाज ऊपर से मंडराते हैं।
बड़े-बड़े नेता टीवी पर लोगों को समझाते हैं।
पर क्या किसी ने इन लोगों के दिल को टटोला?
क्या बहा, क्या रहा, क्या होगा, इसको राजनीति से हटकर तोला।
ऐ मेरे दोस्तों क्या तुम भी, संवेदना से शून्य हो चुके हो ?
बहुत कुछ न खोते हुए भी, तुम बिहार के हजारों बंधु-बांधव खो चुके हो।
अब खोलो आंखें, बढ़ाओ हाथ।
दो उनका साथ, जो हो गये अनाथ।
जिन्होंने खोया है,बाढ़ में सब कुछ।
दिल में लगा है, आघात जिनके सचमुच।
ये अपनी हैं मांएं, ये अपने हैं भाई।
हैं कुछ कारण, जिससे इन पर ये स्थिति बन आई।
अब तो न तूम मूक दर्शक बनो,
भीतर से कुछ आवाजें सुनो।

सिमराही, सुपौल- 6 सितंबर

महामारी-हादसे, किसको पता कितने मरे
बेलही गांव के पास फोरलेन हाइवे पर लगे विषाल राहत षिविर को पार करने के बाद हमलोग एक कटाव पारकर दुअनिया गांव तक पहुंचे थे( सामने एक और कटाव था। षाम गहराने लगी थी हम तय ही कर रहे थे कि इस कटाव के पार जाएं या न जाएं तभी कटाव के उसपार से लोगों का एक रेला आता नजर आया। मर्दों के सिर पर बोरे जिनमें घर चलाने लायक कुछ दिन का सामान होगा, औरतों के गोद में बच्चे, तन पर बहुत कम कपडे, चेहरे पर बौखलाहट। प्रैिक्सस संस्था के साथी अनिंद्यो बनजीZ के मुंह से हठात निकल पडा- यह तो बटबारे के बाद हुए विस्थापन जैसा नजारा है। उस जत्थे में आने वाले एक बूढे ने जैसे ही धरती पर पांव रखा उसकी नजर हमारी ओर पडी। वह बोल उठा- दोसरे जनम भेटल। यानी दूसरा जन्म हुआ। हमारे पूछने पर उन्होंने बताया कि यहां से आठ-नौ किलमीटर दूर परयाही-लालगंज गांव से आ रहे हैं, प्राइवेट नाव से सुबह छह बजे के चले हैं, अभी सांझ में पहुंचे हैं। दरअसल यह गांव कोसी की तत्कालीन मुख्य धारा के उस पार है। गांव चारो ओर भीषण बाढ से घिरा है। बस पांच बीघे का एक प्लाट डूबने से बचा हुआ है, जिस पर आसपास के चार गांव के लोग किसी तरह रह रहे हैै, मगर अब वहां रहना भी खतरनाक हो गया है, पिछले तीन-चार दिन से जबरदस्त बिमारी फेल गई है। एक उल्टी, एक पैखाना में लोग दम तोड दे रहे हैं। रोज चार से पांच लोग मर रहे हैं। उनकी बातें सुनकर हमारी रूह कांप गई। खबर तो हमें भी थी कि महामारी फेल रही है पर इतनी भीषण यह अंदाजा हमें नहीं था, परयाही-लालगंज जैसे न जाने कितने गांव सुपौल, मधेपुरा और अररिया जिले में हैं, जहां अब भी लोग भीषण बाढ में रह रहे हैं, उन गांवों में क्या हो रहा होगा किसी को पता नहीं। सच तो यह है कि बाढ के 19वें दिन भी मरने वालों की सुध लेने वाला कोई नहीं, कितने मरे यह जानना नामुमकिन है। बलुआ जैसे कुछ गांव के लोग कहंा हैं यह किसी को नहीं मालूम, वे किसी राहत षिविर में नजर नहीं आते। मधेपुरा की स्थिति तो सबसे भीषण है, संस्थाओं के लोग भी पानी उतरने का इंतजार कर रहे हैं, लोगों को उनके ही भरोसे कोसी के कोप का मुकाबला करने के लिए छोड दिया गया है। परयाही-लालगंज गांव से आने वाले लोगों में कई हैजा और डायरिया के षिकार थे। उन्हें तत्काल आमीZ के हैल्थ कैंप में भरती कराया गया। पूरे इलाके में भीषण हैजा, डायरिया फेल गया है, सारे अस्पताल और निजी नर्सिंग होम ऐसे मरीजों से पटे हैं। एक प्राइवेट डाक्टर ने तो कॉलरा फेलने की भी आषंका जता दी। इस इलाके में पहले भी कालरा के मरीज मिलते रहे हैं। मगर इस महामारी से मुकाबले की तैयारी बिल्कुल नहीं है। प्रषासन कह रहा है उनके पास बहुत कम डाक्टर हैं। सुपौल जिले में डायरिया, हैजा और सांप कांटने की दवा बहुत कम है। हेल्प-एज इंडिया की टीम मोबाइल क्लीनिक के साथ पहुंचे हैं, मगर उनके पास भी न डाक्टर हैं, न ही उपयुक्त दवाइयां। हमनें अपने स्तर पर दरभंगा मेडिकल कालेज के पीजी के कुछ विद्यार्थियों को बुलाया है और दवाइयों का भी इंतजाम करने में जुटे हैं मगर षिविर लगाने लायक संसाधन हमारे पास नहीं। उम्मीद है कहीं न कहीं से कुछ इंतजाम होगा।
एजेंसियों के नाम पर सिर्फ ओक्सफेम
अनिंद्यो बता रहे थे सुनामी के बाद नागापटटनम में राहत और पुनर्वास के लिए दस हजार के करीब फंडिंग एजेंसियां काम कर रही थीं। उनमें से कई तो दूसरे देषों की थीं। मगर इस इलाके में सुनियोजित तरीके से सिर्फ एक फंडिंग एजेंसी ओक्सफेम काम कर रही है। बेलही में इस संस्था ने एक बडा राहत षिविर लगाया है, जिसमें वे 600 परिवारों के रहने और खाने पीने की व्यवस्था कर रहे हैं। इसके अलावा यह संस्था भीमनगर में भी पीडित परिवारों के बीच सर्वे करवा रही है। वहां भी ऐसे ही कैंप लगाने की योजना है। कैंप में वे फिलहाल टेंट, चटाई, चूडा, सत्तू, बाल्टी, मग, हेलोजेन, फिटकिरी, ओआरएस घोल बंटवा रहे हैं। मगर जब विस्थापितोें की संख्या 30 लाख के पार हो तो ऐसे प्रयास प्यासे को ओस चटाने के बराबर हैै। जरूरत है ऐसे ही हजारो सुसंगठित प्रयास की। बांकी संस्थाएं तो अभी खिचडी बटवाने में ही जुटी है। सरकारी षिविरों में भी कोई सुनियोजित व्यवस्था नहीं। इसके अलावा महिला स्वयंसेवकों की भारी कमी है। हेल्प-एज इंडिया, पीजीवीएस, प्रैिक्सस, यूनिसेफ, एक्षनएड, कासा जैसी कुछ एजेंसियां अभी हालात का जायजा ले रहीे हैं और निकट भविष्य में काम शुरू करने की तैयारी में है।
साहिल पर खडे होकर लहरें गिनने का फैषन
बेलही के कैंप में ओक्सफेम अच्छा काम कर रही हैं, इसके अलावा कई समितियां भी वहां राहत बंटवा रही हैं, मगर वहां से दो किलोमीटर दूर दुअनियां गांव में लगे राहत षिविरों की सुध लेने वाला कोई नहीं। वजह है वहां पहुंचने के लिए पानी के दो-तीन कटाव पार करने पडते है। लिहाजा कोई संस्था वहां काम करने में उत्सुक नहीं। संस्थाएं और समितियां बडे उत्साह से राहत सामगि्रयां लेकर बाढ पीडित इलाकों में पहुंचती हैं और किनारे पर रह रहे पीडितों में बांट कर लौट जाती हैैं। अगर वे थोडी सी मेहनत करें, पानी में उतरने का साहस दिखाएं तो संभव है कई अन्य पीडितों को भी राहत मिल पाएगी।
मुक्ता के बोल
प्रैिक्सस की साथी मुक्ता ने आज मुझे एक नारा दिया है- बाढ पीडितों के बीच भूखे मर जाना कहीं अच्छा है बनिस्पत जीवन भर इस ग्लानि से मरने के कि हमने अपनी नजरों के सामने दम तोड रहे लोगों के लिए कुछ नहीं किया। यह नारा हमेषा हम जैसे लोगों को हिम्मत देगा।

सहरसा - 5 सितंबर

संतोष की माय का ठहाका
कोसी का जिक्र आता है तो रेणुजी साथ-साथ चले आते हैं। इस अंचल के लोगों की जीवटता और दुख-दारिद्र में जष्न मनाने की अदा का वर्णन करने के लिए उन्होंने न जाने कितनों के बोल सहे ण्ण्ण्। फिर भी लोगों ने अब तक नहीं माना कि मौत के सामने ठहाका लगाने वाले माटी की मूरतें नहीं असली दुनिया के बाषिंदे हैं। पर मैनें आज देख लिया, धमारा स्टेषन पर बरौनी से सहरसा जाने वाली टेन मेें ठहाका लगा-लगाकर लोगों को अपने इलाके की बाढ की कहानियां सुनाती संतोष की माय को। जानै छौ सिपाही सब जे बोट लाय के पहिलुक बेर हमर गांम एलै त एक्को बुढवा नाह पर चढै ल तैयार नै भेले। फौजियों की बोट पर चढने के लिए कोई बूढा तैयार नहीं हो रहा था, उन्हें लग रहा था कि कहीं ये लोग गिरफतार करने तो नहीं आ रहे। एगो बनिया मोटरसायकिल पर जाइत रहे कि सामना से ठाढे

बिजनेसमैन मोटरसायकिल पर सवार कहीं जा रहा था कि सामने से कोसी की चार-पांच फुट उंची लहर आती दिखी। वह बाइक छोडकर भागा और एक पेड पर चढ गया। अब पानी उतरने का नाम ही न ले। एक दिन भूखे-प्यासे रहने के बाद अगले दिन उसने मोबाइल से अपने भाई को फोन किया। फिर उसका भाई पांच हजार में तीन तैराकों को लेकर वहां पहुंचा और उसकी जान बचाई। जिंदगी और मौत के ऐसे ही कई किस्से संतोष की माय ने हमें ठहाका लगा-लगाकर सुनाए कि किस तरह एक कलछुल खिचडी के दम पर उसने तीन दिन गुजार लिए, पैदल ही फारबिसगंज से सहरसा आ गई, वगैरह-वगैरह। वह परसों पंजाब जाने वाली है। उसका लक्ष्य है तीन महीने में इतना कमा लेना कि लौटकर जब वह आए तो अपना घर फिर से खडा कर सके। मैनें उसे बताया नहीं कि सरकार उसे उसके घर का मुआवजा देने की योजना बना रही है। मैं चाहता था कि उसकी जीवटता कायम रहे और उसे लोग सलाम करें।
फिर पंजाब को आबाद करेंगे
सचमुच कोसी के लोगों की जीवटता को सलाम करने की जरूरत है। एक भी विस्थापित सरकारी रिलीफ कैंप में रहने को मन से तैयार नहीं। जहां-जहां से पानी उतरने की खबर आती है, वहां के लोग रिलीफ कैंपों को छोड अपने घरों की ओर भागने लगते हैं। क्या भंसा-क्या बचा इसका जायजा लेना है। छपपर ठीक करना है, गीले अनाज को सुखाना है। फिर योजना बनाना है कि कितने दिनों में कितनी मेहनत के बाद सबकुछ पटरी पर आ पाएगा। सीएम घोषणा पर घोषणा कर रहे हैं कि अभी कैंपों में ही रहें, अगले कुछ दिनों में पानी बढ सकता है। मगर जिसे उजडे घरों को फिर से संवारने की फिक्र है उसे भला कैसे रोका जा सकता है। जिन इलाकों में पानी नहीं उतरा वहां के लोग भी रिलीफ कैंपों को छोडकर भाग रहे हैं। कह रहे हैं- यहां बैठकर क्या करना। एक सीजन पंजाब में कमा लिया जाए। जब लौटेंगे तो पानी भी उतर जाएगा और अपने पास पैसा भी होगा जिससे उजडा घर फिर से बसाया जाएगा।
बैराज, सिल्ट और बदली धारा
मनीष के पिताजी रिटायर एसिस्टेंट इंजीनियर हैं। अपने कैरियर के शुरूआती दिनों में उन्होंने कोसी परियोजना के वीरपुर संभाग में काफी वक्त गुजारा है, लिहाजा बैराज, सिल्ट और बदली धाराओं के बारे में उनकी अच्छी समझ है। उन्होंने बताया कि वे लोग हवा-हवाई बातें कर रहे हैं जो कहते हैं कि बैराज की उम्र 27-28 साल ही होती है। अगर बैराज का रेगुलेषन सही तरीके से किया जाए तो वहां कभी गाद जमे ही नहीं। 1991 तक ऐसा किया भी जाता रहा। यानि फाटकों को अदला-बदली कर खोलना। 1991 से पहले वहां अभियंताओं की काफी अच्छी टीम थी पर जब जगतानंद सिंह जल संसाधन मंéी बने तो उन्होंने अभियंताओं के कई पद समाप्त कर दिए। बांकी लोगों का तबादला कर दिया गया। इस वक्त जो लोग वहां थें उन्हें बैराज पर जाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस वक्त जो फाटक खुले थे वही आज तक खुले हैं। ऐसे सिल्ट का पहाड तो खडा होना ही था।

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