Sunday, August 1, 2010

तटबंधों के पिंजरे में लाखों जिंदगानियां


यह उन लाखों कोसी वासियों के दुख की कहानी नहीं है जिन्होंने 2008 में कुछ महीनें कोसी की बलखाती लहरों के थपेड़ों के बीच गुजारे बल्कि यह उन दूसरे लाखों लोगों की दास्तान है जो चालीस साल से इस नदी के थपेड़ों से जूझ रहे हैं. बाढ़ से मुक्ति के नाम पर हुए प्रयोग में सरकार ने इस नदी को जब तटबंधों के बीच कैद किया तो उस पिंजरे से वह इन लाखों लोगों को बाहर निकालना भूल गई. पिछले पचास से अधिक सालों से पिंजरा बंद है और सामने भूखी बाघिन. लोग बार-बार पिंजरे के उस कोने में दुबकते की कोशिश करते हुए जी रहे हैं जहां बाघिन का झपट्टा या उसकी निगाह न पहुंचे. यह दास्तान उन्हीं लाखों कोसी पीड़ितों की है.

17 अगस्त 2008. पचास से अधिक सालों से तटबंधों के बीच कैद कोसी नदी ने खुद को इस कैद से पूरी तरह आजाद कर लिया और बिल्कुल नए इलाके में बहने लगी. पूरी की पूरी 1 लाख 71 हजार क्यूसेक जल प्रवाह वाली इस नदी ने सिल्ट से भर चुके अपने पुराने रास्ते और 16 फीट ऊंचे तटबंध को तोडक़र नया रास्ता बना लिया यह सोचे बगैर कि उस राह में खेत है या मकान है या कस्बा है या गांव. यह सोचना उसका काम था भी नहीं, यह तो सरकारों, नीति नियंताओं और उन्हें लागू करने और उनकी देखभाल करने वाले अभियंताओं का काम था. मगर उन लोगों ने पिंजरे में बंद बाघिन को वैसी सुविधाएं नहीं दी जिससे उसका मन पिंजरे में लगा रहे(वैसे किसका मन पिंजरे में लगता है, आजादी किसको प्यारी नहीं होती), तो उस बाघिन का बाहर निकल आना तो इसी बात पर निर्भर था कि वह कब पिंजरे को तोड़ पाती है. बहरहाल ऐतिहासिक आपदा आई और छह सात महीने तक उत्तर-पूर्वी बिहार के तकरीबन साढ़े पांच सौ गांवों में ठहरी रही. आपदा बड़ी खबर बनी और उस खबर ने करोड़ों की राहत सामग्री और हजारों मददगारों को आमंत्रित किया. वैसे तो जब लोग मुसीबत में हों तो ऐसी बातें करना उचित नहीं होता, मगर कोसी नदी के सबसे बड़े विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र ने उस वक्त ही यह सवाल उठा दिया कि क्या यह मदद उन साढ़े तीन सौ गांव के लोगों को मिल पाएगी जहां अगले साल ऐसी ही बाढ़ आएगी औैर हर साल बाढ़ आती ही है. बाढ़ जिनके जीवन में एक आपदा या एक घटना न होकर स्थायी उपस्थिति के रूप में एक रूटीन के रूप में दर्ज हो गई है. जैसे मार्च में होली आती है, अप्रैल में गर्मियां शुरू होती है, जून-जुलाई में मानसून शुरू होता है, अक्तूबर-नवंबर में विजयादशमी, दीपावली और छठ वैसे ही अगस्त में बाढ़. उनके लिए अगस्त का महीना बाढ़ का महीना होता है और इससे लडऩे के लिए वे जून-जुलाई से ही तैयारियां शुरू कर देते हैं बाढ का पानी जब तक उतरता नहीं वे टापुओं की तरह अपने-अपने घरों में दुबके रहते हैं, सारा काम नाव से करते हैं. बाहरी दुनिया से बस जरूरत भर का संपर्क होता है. अक्तूबर में जब पानी उतरने लगता है तो दुर्गा मां के स्वागत की तैयारियों के साथ उनके जीवन का सवेरा शुरू होने लगता है. यह कहानी एक-दो गांव की नहीं पूरे साढ़े तीन सौ गांव की है औैर यहां आपका ध्यान खीचना चाहूंगा कि साढ़े तीन सौ और साढ़े पांच सौ की संख्या में ज्यादा फर्क नहीं होता. इन्हीं साढ़े पांच सौ गांवों को बाढ़ की आपदा से बचाने के लिए कोसी नदी के दोनो किनारों को ऊंचे तटबंधों से बांधा गया है और उन तटबंधों के बीच साढ़े तीन सौ गांव भी कैद हो गए हैं जिन्हें हर साल उसी बाढ़ की आपदा को झेलता पड़ता है. आप सोचते होंगे कि सरकार ने कम से कम दो सौ गांवों को तो बचा लिया. जी नहीं, आप गलत सोचते हैं, तटबंध बनने के बाद जो नदियां कोसी में मिलती थीं वह अब इस नदी में मिल नहीं पाती, लिहाजा तटबंधों के दोनों किनारों में पूरे साल जलजमाव का नजारा होता है और इस जल जमाव में 4.26 लाख हेक्टेयर जमीन डूबी रहती है. यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि कोसी तटबंध परियोजना का लक्ष्य कुल 2.14 लाख हेक्टेयर जमीन को बाढ़ से बचाना था.

इतना सबकुछ जानने के बाद यह सवाल सहज ही मन में उठता है कि आखिर ऐसी विषम परिस्थितियों में ये लोग रहते ही क्यों हैं? क्या इनका पुनर्वास नहीं हुआ? इसका जवाब है कि इन लोगों के साथ पुनर्वास के नाम पर जो कुछ हुआ वह एक धोखा साबित हुआ. सरकार ने बहुजन हिताय के नाम पर इनसे जो कुर्बानी ली उसने इन लाखों लोगों की जिंदगी तबाह कर दी. आज जो कुछ नर्मदा घाटी में हो रहा है, उससे कहीं बड़ी त्रासदी है कोसी पीड़ितों की कहानी. कोसी के लाखों लोगों के साथ हुआ यह अभियांत्रिकी प्रयोग कहीं अधिक हृदय विदारक है. मगर आज भी यह कहानी सात पर्दों के पीछे छुपी है.

देश की दूसरी नदियों की तरह कोसी का स्वभाव शांत और निर्मल नहीं है. इसके स्वभाव में अल्हड़पन औैर मतवालापन अधिक है.वर्तमान में यह नदी जहां बहती है, महज 150 साल पहले वह यहां से 100 मिलोमीटर पूर्व में बहा करती थी. इसके बाद से वह हर 20-25 साल पर अपना रास्ता बदलकर पश्चिम की ओर खिलकती रही और इस दौरान इस इलाके में भारी तबाही मचाती रही. कोसी नदी के इस व्यवहार के पीछे इस नदी द्वारा लाए गए सिल्ट की अत्यधिक बताई जाती है. इस नदी में मौजूद सिल्ट की मात्रा के बारे में एक ब्रिटिश वैज्ञानिक एफसी हस्र्ट ने 1908 में कहा था कोसी नदी हर साल लगभग 5 करोड़ 50 लाख टन गाद लाती है और मेरा अनुमान है कि इसमें से 3.7 करोड़ टन गाद वह अपने आसपास के इलाके में डाल देती है. 3.7 करोड़ टन गाद का मतलब लगभग 1.96 लाख घनमीटर होता है.हर वर्ष इतनी मात्रा में गाद लाने के कारण नदी की पेटी बहुत जल्द ऊंची हो जाती थी और मजबूरन उसे अपना रास्ता बदलकर निचले इलाके में बहने के लिए मजबूर होना पड़ता था. बहरहाल नदी के इस स्वभाव के कारण स्थानीय लोगों को भारी तबाही का सामना करना पड़ता था. इसके अलावा सालों-साल आने वाली बाढ़ और इसके कारण फैलने वाली हैजा, मलेरिया और कालाजार जैसी बीमारियां अलग थीं. त्रस्त जनता अपने नेताओं से इसकी गुहार लगाती और नेता इस गुहार को केंद्रीय प्रशासन तक पहुंचाते. ब्रिटिश सरकार तो इस समस्या के समाधान के प्रति जरा भी इच्छुक नहीं थी, उन्हें जनता के दुख दूर करने के लिए करोड़ों खर्च करने की क्या पड़ी थी. ऐसे में जब भारत आजाद हुआ और देश की कमान पं. जवाहर लाल नेहरू जैसे संवेदनशील और वैज्ञानिक दृष्टिïकोण वाले नेता ने संभाली तो कोसी वासियों में उम्मीदें जगीं कि पंडितजी उनकी इस समस्या का कोई न कोई हल जरूर निकालेंगे.

जब समस्या उनकी निगाह में लाई गई तो इसके बेहतर समाधान के रास्ते तलाशे जाने लगे. उस समय कई विकल्पों पर विचार किया गया और अंतत: इस समाधान पर सहमति बनी कि भारत-नेपाल सीमा पर भीमनगर कस्बे के पास कोसी नदी पर एक बराज बनाया जाए और इस अल्हड़ नदी को दो तटबंधों के बीच गिरफ्तार कर लिया जाए. फिर जैसा कि आम तौर पर ऐसी खर्चीली इंजीनियरिंग आधारित समाधानों के साथ होता है, इस परियोजना से कुछ अन्य फायदों की गुंजाइश निकाली गई. यानि पूर्वी और पश्चिमी कोसी नहर परियोजनाएं जिससे तकरीबन 10 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई का लक्ष्य रखा गया था और इसके अलावा सुपौल जिले के कटैया में 16 मेगावाट क्षमता वाली जल विद्युत परियोजनाएं.

कागज पर यह परियोजना इतनी सम्मोहक थी कि अभियंताओं और देश के नीति नियंताओं ने इसके नफा-नुकसान का बारीकी से आकलन किए बगैर इसे मंजूरी दे दी. पहले तो स्थानीय लोगों को लगा कि इस परियोजना से उनके दिन फिर जाएंगे, पूरा इलाका पंजाब-हरियाणा की तरह हरा-भरा होगा और खेंतें सोना उगलेंगी. मगर उनकी यह आस छलावा साबित हुई. आज की तारीख में परियोजना शुरू होने के 57 साल बाद भी पश्चिमी कोसी नहर परियोजना का एक चौथाई काम भी पूरा नहीं हुआ है, इसकी लागत जरूर हर साल बढ़ती गई है. यह परियोजना अपने लक्ष्य के 7 फीसदी से भी कम जमीन की सिंचाई कर पाती है. पूर्वी कोसी नहर परियोजना भी कुछ हद तक ही सफल हो पाई है. इस परियोजना का काम पूरा हो चुका है, मगर इसके बावजूद यह अपनी क्षमता के 20 फीसदी भूभाग की ही सिंचाई कर पाती रही है, मगर हाल के दिनों में नहरों में इतना बालू भर गया है कि पिछले एक दशक से इन नहरों से सिर्फ बाढ़ का पानी आता है, सिंचाई नहीं हो पाती. हां हर साल नहर से सिंचाई की लागत वसूलने वाली सरकारी पर्ची जरूर आ जाती है और इसका भुगतान न करने पर जमीन के मालिकाना हक से महरूम करने का खतरा बना रहता है. कटैया विद्युत परियोजना भी बालू भर जाने के कारण बंद ही रहती है.

अब कुछ बातें बाढ़ नियंत्रण की, जो इस परियोजना का प्रमुख लक्ष्य रहा है. नदी को बांधने वाला तटबंध अपने निर्माण के बाद के 47 सालों में 7 बार टूृट चुका है, जिसके कारण सैकड़ों गांव तबाह होते रहे हैं. इसके अलावा इन तटबंधों के कारण होने वाले जलजमाव से 4.26 लाख हेक्टेयर जमीन लगभग पूरे साल डूबी रहती है, जबकि इस परियोजना का लक्ष्य 2.14 लाख हेक्टेयर जमीन को बाढ़ से सुरक्षा देना रहा है. लगभग पचास साल पहले पूरी हुई इस परियोजना का हिसाब-किताब आज की तारीख में कौन ले? मगर हद तो इस बात की है कि इस उदाहरण से आज की तारीख में सबक सीखने के लिए भी कोई तैयार नहीं.

यह तो कोसी परियोजना की विडंबना की कहानी है जिसके बारे में श्री दिनेश कुमार मिश्र ने अपनी किताब दुई पाटन के बीच मेंमें विस्तार से लिखा है. यह किताब मूलत: उन्हीं लाखों लोगों के कष्टïमय जीवन के बारे में है जो कोसी नदी के दो पाटों यानि तटबंधों के बीच में फंसे हैं. तटबंध निर्माण के वक्त जैसा कि राजनेता किया करते हैं, उन्होंने लोगों को गोल-मटोल लहजे में आश्वासन दिया कि इस परियोजना से जो भी लोग प्रभावित होंगे सरकार उन्हें बेहतर जमीन और बेहतर पुनर्वास उपलब्ध कराएगी. पचास साल पहले के लोगों के लिए पुनर्वास की तिकड़में अनजानी थी, उन्होंने सहज विश्वास कर लिया. जब पुनर्वास की बारी आई तो सरकार ने बड़ा ही रोचक समाधान तैयार किया. इसके मुताबिक तटबंध के अंदर जो जमीन है वहां बाढ़ की समस्या साल में सिर्फ तीन महीने रहेगी, यानि वहां की जमीन पर खेती करने में कोई परेशानी नहीं. ऐसे में लोगों को न तो वहां की जमीन का मुआवजा मिलेगा और न ही उसके बदले में जमीन. हां उनके घरों के बदले कुछ लोगों को जमीन उपलब्ध कराई गई और कुछ लोगों को घर के बदले दो किस्तों में नकद मुआवजा देने की बात कही गई. जिन लोगों को जमीन दी गई उनकी जमीन तटबंध के कारण देरसबेर जलजमाव का शिकार हो गई और जिनसे मुआवजा का वादा किया गया उनमें से अधिकांश को मुआवजे की एक किस्त से ही संतोष करना पड़ा. इसके बाद आने वाले समय में लोगों की समझ में आया कि अगर खेत घर से पांच किलामीटर की दूरी पर भी हो तो खेती करना और फसल की रक्षा कर पाना बहुत कठिन व्यवसाय साबित होता है. ऐसे में कुछ लोगों ने अपने पैत्रिक जमीन को औने-पौने दाम में बेचकर दिल्ली-पंजाब की राह पकड़ ली और बांकी बचे लोग पुनर्वास में मिली जमीन का मोह त्याग कर वापस उसी नर्क में पहुंच गए जहां उनकी आजीविका का साधन उनके खेत थे.

ऐसे लोगों के लिए अब सामने नदी थी और माथे पर सवार उनकी किस्मत. सरकार तो इतनी दूर थी कि उनसे भेट-मुलाकात छठे-छमाही ही हो पाती. लिहाजा एक अजीब सी स्थिति पैदा हुई. तटबंधों के बीच जहां लाखों लाचार लोग रह रहे हैं, वहां न तो स्कूल हैं, न बिजली, न डाकघर, न फोन-मोबाइल और अस्पताल व थाना-पुलिस भी नहीं. यानि इक्कसवीं सदी के शुरुआत में वहां सोलहवीं सदी का नजारा देखा जा सकता है. सवारी के नाम पर घोड़ा, बैलगाडिय़ां और नाव. हर चार-पांच साल में या तो बाढ़ उनके आशियाने को उजाड़ देती है या फिर नदी से आने वाला बालू उनके घरों को भर कर रहने लायक नहीं छोड़ता. लिहाजा विस्थापन दर विस्थापन. तटबंधों के अंदर कई ऐसे परिवार हैं जो सत्रह बार विस्थापित हो चुके हैं. वहां रात के वक्त अगर कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए तो उसका भगवान ही मालिक होता है, क्योंकि सुबह होने से पहले उस पिंजरे से निकल पाने का ना तो रास्ता होता है और न ही लोगों में उस अंधेरे बियाबान में निकलने की हिम्मत. आपस के झगड़े लोग खुद सुलझाते हैं, चुकि वहां पुलिस नहीं है ऐसे में ताकतवर ही अक्सर सही साबित होता है. बार-बार आने वाली बाढ़ के कारण खेतों का सीमांकण मिट जाता है, फिर फैसला ताकत के जोर पर होता है. फिर भी लोग रहते हैं, क्योंकि दूसरा कोई बेहतर विकल्प नहीं है. सरकार उन्हें अक्सर भूल जाती है, जब याद आता है तो उनका तर्क यही होता है कि इन लोगों ने अपनी मर्जी से वहां रहने का फैसला किया है, हमने तो उनका बेहतर पुनर्वास किया था. अब अगर वे वहां रहने के बदले यहां रह रहे हैं तो जरूर उन्हें यहां फायदा नजर आ रहा होगा.

अगस्त 2008 में जब नदी ने अपना रास्ता बदल लिया तो इस इलाके के लोग काफी खुश हुए कि नदी ने उन्हें बख्श दिया है, अब दुबारा लौटकर उनके गांव नहीं आएगी. मगर एक बार फिर समाधान के मसले पर इन लोगों के बदले इंजीनियरों की चली और नदी को फिर से सफलतापूवर्क इन्हीं तटबंधों के बीच बहने को मजबूर कर दिया गया. अब नीतीश सरकार इन तटबंधों पर पक्की सडक़ें बनवा रही है, ताकि आवागमन की सुविधा हो और तटबंधों की बेहतर निगरानी की जा सके. मगर इस अभियान में उन हजारों लोगों के घर उजड़ रहे हैं, जो बार-बार के विस्थापन से परेशान होकर अपने इलाके से सबसे सुरक्षित स्थान माने-जाने वाले इन तटबंधों पर ही झोपडिय़ां बनाकर बस गए थे. खैर उनका क्या? उन्हें तो उजड़-उजडक़र बसने की आदत हो चुकी है. सरकार इसी तरह लोगों की भलाई के नाम पर ठेका कंपनियों और इंजीनियरों का घर बसाती रहे.

यह आलेख नागरिक विकल्प नामक पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है.

Tuesday, June 9, 2009

नेपाली संसदीय समिति ने किया कुसहा का दौरा

इनरुआ, नेपाल। वशिष्ठ कंस्ट्रक्शन कंपनी द्बारा काम पूरा हो जाने का दावा करते हुए कुसहा से बोरिया बिस्तर समेट लेने के छह दिन बाद नेपाल की एक संसदीय समिति ने तटबंध का दौरा किया। इस नेचुरल रिसोर्सेज एंड मीन्स कमेटी ने भी सर्वेक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा है कि काम अभी पूरा नहीं हुआ है। शांता चौधरी की अध्यक्षता वाली इस 13 सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पूर्वी तटबंध के प्रकाशपुर, राजा बास तथा पुलठेंगौड़ा इलाके हाई रिस्क जोन में हैं। समिति के सदस्य और पूर्व जल संसाधन मंत्री लक्ष्मण घिरमिरे ने बताया कि मानसून के दौरान कोई बड़ा हादसा हो सकता है। घिरमिरे ने कहा हमें यहां का काम देखकर तसल्ली नहीं हुई। भारतीय ठेकेदारों का काम पारदर्शी नहीं है। वहीं समिति के अध्यक्ष ने कहा है कि हमने इस बारे में भारत और नेपाल दोनों सरकारों को सूचित कर दिया है। गौरतलब है कि तटबंध के मरम्मत में जुटी वशिष्ठ कंपनी ने 1 जून को मरम्मत का काम पूरा होने की घोषणा कर दी थी, जबकि सथानीय प्रशासन के मुताबिक अभी काफी काम बचा था।

कोसी तटबंध की मरम्मत में हैरतअंगेज लापरवाही


काम अधूरा छोड़ लौट गई कंस्ट्रक्शन कंपनी

कोसी क्षेत्र के लाखों लोगों की जान के साथ एक बार फिर खिलवाड़ किया जा रहा है। 18 अगस्त, 2००8 को आए भीषण जल प्रलय के बाद कुसहा के पास टूटे तटबंध की मरम्मत में जुटी कंस्ट्रक्शन कंपनी वशिष्ठ अपना काम अधूरा ही छोड़कर लौट गई है। कंपनी का दावा है कि उसने तटबंध के मरम्मत का काम पूरा कर लिया है मगर मरम्मत स्थल पर काम की देखरेख करने वाले सुनसरी जिला प्रशासन अधिकारी के मुताबिक अभी काम पूरा नहीं हुआ है, लगभग 15 दिनों का काम अभी बांकी है। सुनसरी के मुख्य जिलाधिकारी हरि कृष्ण उपाध्याय बताते हैं कि हमें इस बात की जानकारी तो नहीं है कि उन्होंने काम क्यों अधूरा छोड़ दिया। मगर अपने अनुभव से यह जरूर कह सकते हैं कि अभी तटबंध के मरम्मत में कम से कम 15 दिन और लगेंगे। उन्होंने कहा कि कंपनी द्बारा इस तरह अचानक काम छोड़ देने को लेकर बिहार राज्य सरकार के जल संसाधन विभाग को कोई न कोई कदम उठाना चाहिए। जाहिर है इस बात को लेकर नेपाल में काफी चिंता है क्योंकि तटबंध टूटने की स्थिति में नेपाल की जनता सबसे पहले बाढ से प्रभावित होगी। उन्होंने कहा कि कंपनी तय समय 31 मार्च के बाद दो माह तक अपना काम पूरा नहीं कर पाई थी और इस वजह से उसे रोज नेपाल सरकार को हर्जाना चुकाना पड़ रहा था। उनके अचानक इस तरह चले जाने के पीछे यह एक वजह हो सकती है। इस बीच स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि कंपनी ने बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग को रिश्वत देकर काम पूरा होने का प्रमाणपत्र हासिल कर लिया है। बहरहाल सच्चाई जो भी हो मगर कोसी इलाके के लाखों लोग अभी पिछली त्रासदी से उबर भी नहीं पाए थे कि उनका जीवन जल संसाधन मंत्रालय की लापरवाही के कारण एक बार फिर मौत के जाल में फंसने जा रहा है।

Saturday, January 10, 2009

भूखमरी की हालत...महेंद्र ने दम तोड़ा




कोसी के बाढ़ पीड़ित इलाके में जब भी कोई राहत की बात करता है तो चारों ओर से 10 तरह की आवाजें उसे चुप करा देती हैं कि अरे इतना राहत तो बंट रहा है. सरकारी और संस्थाओं की ओर से भी. मगर सुपौल के भरतपुर गांव में महेंद्र शर्मा की मौत नीतीश सरकार की अफसरशाही की बेलगाम कार्यप्रणाली और दंभ को करारा तमाचा है. छठ के बाद से जबसे उसे जबरन राहत शिविर से वापस उसके गांव भेज दिया गया था, वह लगातार फांकाहाली का जीवन गुजार रहा था. जब अखबारों में मुख्यमंत्री की टहलती तसवीर के साथ एक एक बाढ़ पीड़ित को राहत पहुंचाने वाले विज्ञापन छप रहे थे. उस वक्त भी महेंद्र शर्मा राहत की पहली किश्त के लिए टकटकी लगाये बैठा था. पत्नी और तीन बच्चों से भरे परिवार को खिलाने के लिए आखिरकार उसे सम्मानित जीवन का बाना उतारकर भीख मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा. मगर जिस गांव में बाढ़ की तबाही से छोटे-बड़े सब एक जैसे हो गये हों और इस पर अधिकांश लोंगों को बाढ़ के साढ़े चार माह बीतने के बावजूद सरकारी राहत की पहली किश्त भी न मिली हो, वहां कौन किसे भीख दे सकता है. महेंद्र शर्मा और उसके अन्य ग्रामीणों में फर्क सिर्फ इतना था कि वे अभी तक हालात से मुकाबला कर रहे थे और महेंद्र बेबस होकर हार गया. लिहाजा भीख से इतना मिलता था कि हफ्ते में दो तीन वक्त के खाने का ही जुगाड़ हो पाये. ऐसे में धीरे-धीरे उसका शरीर कमजोर पड़ता गया और आखिरकार 15 दिसंबर के आसपास उसने बिस्तर (पकड़) लिया. अब वह घूम घूम कर भीख मांगने के काबिल भी नहीं रहा. पड़ोसी दया कर उसके बच्चों को कभी कभी कुछ खिला देते थे. मगर उसे पूछने वाला कोई नहीं था. उसकी बेटी अनीता बताती है कि बापू ने आखिरी बार खाना 25 दिसंबर गुरुवार को खाया था. अगले आठ दिन तक उसे अन्न का एक दाना भी नसीब नहीं हुआ. कमजोर और भूखा शरीर कब तक लड़ाई लड़ता आखिरकार दो जनवरी को उसने दम तोड़ दिया.उसकी कंगाली इस हाल में पहुंच गयी थी कि उसके घर वाले उसके अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां तक नहीं जुटा पाये और हिंदू धर्म का होने के बावजूद उसे दफना दिया गया. (देखें महेंद्र शर्मा की कब्र के पास बैठे उसके छोटे बेटे संदीप की तसवीर).
उस दिन के बाद से उसकी पत्नी रनिया देवी थाना, ब्लाक मुखिया, पत्रकार हर किसी के सामने रो-रोकर यह दास्तान सुनाती है. मगर कोई उसकी शिकायत दर्ज करने को तैयार नहीं. क्योंकि अगर प्रशासन यह मान लेता है कि महेंद्र शर्मा की मौत भूख से हुई तो कलेक्टर से लेकर बीडीओ तक हर अफसर की गर्दन फंसेगी. लिहाजा हर अधिकारी अपने प्रभाव से इस खबर को येन केन प्रकारेण मीडिया में कहीं आने नहीं दे रहा.
अब थोड़ी चर्चा इस बात की महेंद्र शर्मा की मौत के पीछे किस तरह अफसरशाही की कार्यप्रणाली जिम्मेवार है. छातापुर प्रखंड के लालगंज पंचायत (भरतपुर गांव इसी पंचायत में आता है) में आज तक 900 बाढ़ पीड़ित परिवारों को सरकारी राहत की पहली किश्त भी मयस्सर नहीं हुई है. वजह उन लोगों के नाम ना तो बीपीएल सूची में है और न तो एपीएल सूची में. भरतपुर में जब राहत की पहली किश्त बंट रही थी तो कई इलाकों से ऐसी समस्याएं आयीं थीं. तब सरकार ने आदेश जारी किया था कि कोई बीपीएल-एपीएल सूची मान्य नहीं होगी, हर पीड़ित को राहत मिनी चाहिए. लिहाजा कई इलाकों में वोटर लिस्ट के आधार पर बंटवारा हुआ तो कई जगह छूटे हुए लोगों से आवेदन मांगे गये. और उन्हें स्वीकार कर राहत उपलब्ध करा दी गयी. इन प्रक्रियाओं के बावजूद अधिकतर इलाकों में राहत नवंबर माह तक बांट दी गयी मगर लालगंज पंचायत के उन परिवारों को आज 10 जनवरी तक राहत की पहली किश्त भी नहीं मिल पायी है. हालांकि पांच सौ लोगों के आवेदन स्वीकृŸत हो चुके हैं पर उन्हें राहत मिली नहीं. मगर क्यों इस सवाल का जवाब कोई देने की स्थिति में नहीं है. सरकारी कर्मचारी सात जनवरी से हड़ताल पर हैं. लालगंज के पूर्व उप मुखिया रंजीत कुमार रमण बताते हैं कि यह सब अफसरों की ढिलाई के कारण हो रहा है. आपूर्ति पदाधिकारी से लेकर अनुमंडल विकास पदाधिकारी त्रिवेणीगंज तक हमेशा व्यस्त ही नजर आते हैं. हमलोगों के बार-बार गुहार लगाने के बावजूद हमेशा टाल मटोला करते रहते हैं. अभी तक एक महेंद्र मरा है यही हालत रही तो अगले 15 दिनों में इस पंचायत में कुछ और मौते हो सकती हैं.
अब दूसरा सवाल कि इंसान या तो गरीबी रेखा से उपर (एपीएल) या गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) ऐसे में एक पंचायत में 900 परिवार इस सूची से बाहर कैसे हो जाते हैं. इसका जवाब भी अफसरशाही तिकड़मबाजी में ही छूपा है. जब पंचायतों की ओर से बीपीएल सूची ब्लाक में पेश की गयी तो बीडीओ महोदय ने आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने लोग गरीब कैसे हो सकते हैं. यह फरमान जारी हुआ कि 20 प्रतिशत गांव बीपीएल सूची से काट दिये जायें. फरमान की तामिल हुई और करीब 20 प्रतिशत लोग न तो एपीएल सूची में रहे और न ही बीपीएल. उन्हीं लोगों में मृतक महेंद्र शर्मा भी हैं. भूमिहीन और रोजगारविहीन होने के बावजूद, दूसरों की जमीन में झुग्गी बना के रहने के बावजूद वह गरीब नहीं था. लिहाजा उसे वर्षों से कोई सरकारी सुविधा नहीं मिल रही थी. नरेगा के अंतर्गत उसका जॉब कार्ड भी नहीं बना. अब उसकी मौत के बावजूद मुआवजा तो दूर उसके परिवार को पारिवारिक योजना का लाभ भी नहीं मिलेगा, जिसके तहत बीपीएल परिवार के मुखिया के मौत के बाद तत्काल 10 हजार की सरकारी राहत मिलती है. इसे कहते हैं सरकारी कलम की मार. महेंद्र शर्मा और लालगंज के 900 परिवार और इस इलाके के न जाने कितने परिवार न तो गरीबी रेखा के नीचे हैं और न उपर. वे न जाने कहां हैं. बहरहाल, इसी हफ्ते हमने अखबार में बिहार सरकार की ओर से प्रकाशित पूरे पेज का विज्ञापन देखा. जिसमें मुख्यमंत्री बता रहे थे कि बाढ़ पीड़ित इलाके के लिए सरकार ने कितना कुछ किया है. संभवत: उसी दिन या एक दो दिन आगे पीछे यह खबर भी पढ़ी कि सुपौल के राघोपुर मुख्यालय में बाढ़ पीड़ितों ने खाद्य निगम के गोदाम लुटने की कोशिश की. बचाव में पुलिस को गोलियां चलानी पड़ी, पांच बाढ़ पीड़ित गिरफ्तार कर लिये गये. गिरफ्तार बाढ़ पीड़ित अपनी किसमत को सराह रहे होंगें कि चलो जेल में कम से कम खाना तो मिलेगा.
अंत में मुख्यमंत्री महोदय से एक अनुरोध है कि उनके राहत कोष में जो पैसा जमा है उससे बड़ी मात्रा में बंदुकों की गोलियां ही खरीदवा ही लें, क्योंकि बाढ़ पीड़ित तो ऐसे हैं कि इतना सब कुछ करने के बावजूद भूखे ही रह जाते हैं. गोदाम तो तोड़ने की कोशिश करते ही हैं, सरकार को बदनाम करने की कोशिश में भूखे मर भी जाते हैं.

Sunday, December 21, 2008

बालू पर फसल उगाने की जद्दोजहद

मधेपुरा जिला मुख्यालय से 16 किमी पुरब है शंकरपुर प्रखंड. इसके रायधीर पंचायत में करीब डेढ़ महीने तक पानी रहा. ऊपरी इलाका होने के कारण पानी यहां ठहरा नहीं. रायधीर बसंतपुर के बीच मुरलीगंज ब्रांच कैनाल में बसंतपुर की ओर अब भी पानी लबालब भरा हुआ है. यहां 20 अगस्त को पानी पहुंचा, लेकिन ऊपरी इलाका होने के कारण रायधीर पंचायत में 27 अगस्त को पानी घुसा. हम बढते हैं कुमारखंड ब्लाक की ओर. इस पूरे इलाके में पिछले एक पखवाडे से सूरज नहीं उग रहा. खराब मौसम ने हमारी राह और दुरुह बना दी थी. पर हमारी यात्रा अनवरत जारी रही, शायद यहां के विकट हालात लगातार हमारी तकलीफों को कम कर देती. कुमारखंड ब्लाक के टेंगराहा परिहारी पंचायत के टेंगराहा गांव की हालत हमें दुर से देखने पर दूसरे गांवों से अच्छी लगी. यहां पानी निकल चुका था. किसान अपने खेतों में काम में लगे थे. हमें खुशी हुई कि चलो अगली फसल होने के बाद इनकी हालत सुधर जायेगी. लेकिन यहां के किसानों के चेहरे से चमक गायब थी. बाढ से लडने की थकान तो थी ही, अनिश्चित भविष्य की चिंता भी इनकी आंखों में साफ पढी जा सकती थी. नदी के किनारे होने के कारण खेतों में कम से कम चार इंच तक बालू भर गया है. इन्हें खेतों से निकाल पाना संभव नहीं दिखता और ऐसी हालत में बीज बोने के बाद फसल क्या होगी, यही चिंता किसानों को खायी जा रही. फिर भी किसान कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि इसके सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं. वे इन बालू भरे खेतों में गेहूं लगा रहे हैं. लेकिन हालत यह है कि गेहूं के छोटे छोटे पौधे की पत्तियां जल रहें हैं, भूरे पडते जा रहे हैं. इन किसानों को बीज तक के लिए कोई सरकारी मदद नहीं मिल रही. इस उम्मीद पर कि कुछ तो फसल होगी यह गेहूं की रोपनी तो कर रहे हैं, लेकिन हाइबि्रड बीज का इस्तेमाल इनके बस की बात नहीं. पटवन, सिंचाई की भी इन किसानों को कोई उम्मीद नहीं. खेतों को हुए नुकसान के मुआवजे के तौर पर 4000 रुपये प्रति हेक्टेयर का मुआवजा दिया गया यानी 1600 रुपये बीघा. बाढ में किसानों की खडी फसल तबाह हो गयी. अब उन्हें और फसल होने की उम्मीद नहीं, ऐसे में यह मुआवजा उनकी कितनी मदद कर सकता है, यह सोच पाना भी भयावह है. दूसरे के खेतों में काम करने वाले मजदूरों की दास्तानटेंगराहा गांव का सूरतलाल यादव अपने चार बच्चों के साथ खेतों में जी तोड मेहनत कर रहा था. पूछने पर पता चला कि यह उसकी अपनी जमीन नहीं. बाढ के पहले उसने किसी तरह पैसे जुगाड कर 8000 रुपये लीज पर यह खेत बटैया पर लिया था. बडे अरमान के साथ उसने अधिक पैदावार की उम्मीद में धान की हाइबि्रड बीज बोयी. खाद सहित कुल उसने इन खेतों पर 4500 रुपये खचर् कर डाले. लेकिन बाढ आयी और उसकी पूरी फसल डूब गयी. वह तबाह हो गया. उसे सरकारी मुआवजा भी नहीं मिल सकता, क्योंकि सरकारी नियमों के मुताबिक जमीन के मालिक को ही मुआवजा मिल सकेगा. और जमीन के मालिक उसके साथ जाना नहीं चाहते. वह किसी तरह अपने बालू भरे खेतों में फसल बोने की कोशिश कर अपना नुकसान कम करने की कोशिश तो कर रहा है, लेकिन यह बात भी वह अच्छी तरह जानता है कि यह कोशिश जल्द ही दम तोड देगी।

जिंदगी अब भी है बेपटरी

कटाव रोकने के लिए लोगों ने अपने घरों में बालू की बोरियां लगा रखी हैं.

बाढ का पानी उतरा, तो हर जगह एेसे कटाव बनते चले गये.

सरकारी राहत नहीं पहुंचते देख लोगों ने सामूहिक प्रयास कर बांस के खरपच्ची से पुल बना लिये हैं.


जानवरों की हड्डियों को बेचकर दो जून की रोटी जुटाने की जद्दोजहद जारी है.







तसवीरों के आइने में हाल ए बिहार

खेतों में अब भी जहां तक नजर जाती है पानी ही पानी नजर आता है.

सबकी आंखों में अब आंसू सूख गये हैं.

अब हर ओर यही नजारा देखने को मिलता है.





Friday, December 19, 2008

सौ साल के गंगोइ की बहादुरी

हिरोलवा गांव में हमारी मुलाकात सौ साल की उम्र पार कर चुके गंगोइ यादव से हुई. इनकी हड्डियां जरूर बूढी हो गयी हों पर हौसला नहीं. वे बताते हैं कि इस बार जब बाढ आयी, तो सभी दूसरी सुरक्षित जगहों पर चले गये. गांव में केवल 10 से 15 लोग रह गये. मैं भी रुक गया. बाढ से मुझे बिल्कुल डर नहीं लगा. वह बताते हैं कि वे अपनी जिंदगी में पहले भी इस तरह की बाढ देख चुके हैं, इसलिए यह बाढ उनके लिए एक सामान्य घटना की तरह ही थी. उन्होंने बताया कि कोसी पहले इसी ओर से बहा करती थी, उस समय 1934 के आसपास भयंकर बाढ आयी. उस समय नदी में घडियाल हुआ करता था, इसलिए डर अधिक लगता था. अब तो उसका भी डर नहीं है. मैंने गांव में रुककर सबके सामानों की देखभाल की. जिसके कारण आज लोग मेरे काम भी आ रहे हैं.

आंखों के सामने मर रहे हैं जानवर

हमने अपनी अगली यात्रा शंकरपुर ब्लाक के चिरुआ मधेली पंचायत से शुरू की. जगह बदलती जाती पर तसवीर वही रहती.इस पंचायत के हीरोलवा गांव में अभी तक जिंदगी पटरी पर नहीं आयी है. खेतों में ढाई से तीन फीट तक पानी अब भी भरा है. सबसे अधिक दुश्वारियां जानवरों के लिए है. ग्रामीण इलाकों के लिए पशुधन से बडा कुछ भी नहीं। आज वही धन यहां के लोंगों के हाथ से फिसलता जा रहा है. अकेले हीरोलवा गांव में 600 से 700 बकरियां मर चुकी हैं. गाय भैंस भी लगातार दम तोड रहे हैं. बाढ से सबसे अधिक नुकसान जानवरों को हुआ. बाढ के पानी में हजारों जानवर ग्रामीण और इंसान मर गये. उनके मरने से वह पानी विषैला हो गया. जो जानवर बचे, उन्हें वही पानी पीने को मजबूर होना पडा. विषैला पानी पीने से जानवर लगातार मरते रहे और ग्रामीण बेबस आंखों से उन्हें मरते हुए देखते रहे. उनके पास इसके सिवाय कुछ और रास्ता नहीं है. जो खुद अपनी प्यास बुझाने के लिए संघषर् कर रहे हों, वह अपने जानवरों के लिए पीने के पानी का इंतजाम कहां से करें। हिरोलवा के मात्र 10 से 15 फीसदी परिवारों के पास ही पिछले साल का अनाज बचा है. बाकी 80 फीसदी परिवारों को एक जून की रोटी के भी लाले हैं.
हीरोलवा से आगे बढने पर मधेली साइफन मिलता है. यहां नीचे से नदी ओर पुल से नहर गुजरती है. कोसी ने जब उफान मारा तो साइफन टूट गया. नहर और नदी एक हो गयी. जहां सूखा था, वहां 15 से 16 फुट पानी आ गया और तेज धारा बहने लगी. मोजमा में दो जगह नहर और एक जगह साइफन टूट गया. जिरवा नदी जो मौसमी नदी बन गयी थी, अब भरपूर नदी बन चुकी थी, इसकी धारा इतनी तेज हो चुकी थी, कि गांव के गांव इसमें समाते चले गये. मोजमा पंचायत में भी पानी भर गया. अब यहां से पानी उतर गया है. लेकिन अपने पीछे जानवरों की हड्डियों का ढेर छोड गया. इनमें सबसे ज्यादा बकरियां हैं।
रायफल ढूंढने के एक हजार
इस बीच, एक वाकिया हुआ जो ग्रामीण कभी नहीं भुलते. मौजमा हिरोलवा के बीच जो नहर टूटी थी, उसमें बीडीओ और सिपाहियों की नाव पलट गयी. सिपाही तो किसी तरह बाहर आ गये, लेकिन उनकी रायफल डूब गयी. वहीं घोषणा की गयी कि रायफल ढूंढने पर ग्रामीणों को एक हजार रुपये इनाम मिलेगा. ग्रामीणों ने काफी मशक्कत के बाद रायफल तो ढूंढ दी, लेकिन इनाम अभी तक नहीं.

Wednesday, December 17, 2008

घर मिला, पर जिंदगी नहीं

इस बात को चार महीने हो गये. अ।र्थिक मंदी और मुंबई पर हुए हमले ने सब कुछ भुला दिया. कोसी के कहर के मारे लाखों लोगों के अ।ंसूं, उनकी अ।ंखों में ही ठहरे हैं. अब उनकी सिसकियों को सुनने वाला कोई नहीं. हमने अपने अभियान की शुरुअ।त मधेपुरा से करीब 12 किमी दूर शंकरपुर ब्लाक के सोनवषार् पंचायत से की.इन चार महीनों में भले ही दुनिया में बहुत कुछ बदल गया हो, यहां के लोगों का ददर् वही है. वे अपने घरों को तो लौट अ।ये हैं, लेकिन उनकी जिंदगी नहीं बदली. उनके खेत खलिहानों में अब भी एक से ढाई फीट तक पानी जमा है. गांव की सडकें व घरों पर से तो पानी निकल गया है, लेकिन एक मुक्कमल जिंदगी जीने के लिए यह काफी नहीं. जहां तक नजरें जाती हैं, अब भी पानी ही दिखता है. खेतों में पानी जमा होने के कारण धान की फसल हुई नहीं, अगले कई माह तक किसी तरह की पैदावार हो सके, एेसा मुमिकन नहीं दिखता. बाढ के समय जो सरकारी सहायता मिली, दाना दाना गिनकर खचर् करने के बावजूद अब खाने के लाले हैं. सरकारी राहत के तौर पर गांव में हर परिवार को एक िक्वंटल चावल और 2250 रुपये नगद दिये गये थे. यह सहायता कम से कम तीन माह तक दी जानी थी, लेकिन एक बार जाने के बाद सरकारी हुक्मरानों ने दुबारा इस गांव का रुख नहीं किया. इस पंचायत के सात लोगों ने बाढ में अपनी जान गंवायी. प्रशासन ने उनके पिरवारों को एक एक लाख के मुआवजे की घोषणा तो कर दी, पर मिला सिफर् एक को. इस पंचायत के लोग थोडे से इस मामले में भाग्यशाली रहे कि कोसी तटबंध के टूटने के आठ दिनों बाद यहां पानी घुसा. इस बीच लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का मौका मिल गया. अपनी जिंदगी भर की गाढी कमाई को भगवान भरोसे छोड यहां के लोगों ने लालपुर हाइस्कूल में शरण ली. पानी बढा तो इन्हें सिंहेश्वर, लालपुर, हरदी, सहरसा के राहत कैंपों की ओर रुख करना पडा. करीब महीने भर बाद ये अपने घर लौटे और तब शुरू हुई फिर से जिंदगी शुरू करने की जद्दोजहद. वल्डर् विजन, राम कृष्ण मिशन, एपी कोडर् ने रिलीफ बांटी. लालपुर, सरोपट्टी, सिंहेश्वर अ।दि गांव के लोंगों ने यहां अ।कर राहत साम्रगी भी बांटी.पर इतना काफी नहीं है. इतनी बडी प्रभावित अ।ब।दी के लिए एक सक्षम मसीनरी का होना जरूरी है. वह सरकार के पास है. पर उसका उपयोग वह कर नहीं पा रही और बाढ पीडितों को उनके हाल पर छोड दिया गया

साइबेरियन पक्षियों ने किया रुख
एक विशाल भूभाग में पानी भर जाने से किसी और को फायदा हुअ। हो या नहीं, साइबेरियन पक्षियों को एक और शरणस्थली मिल गयी है. जो गिद्ध इस इलाके से विलुप्त हो चले थे, अब फिर से दिखने लगे हैं.

Tuesday, November 4, 2008

नई राह पर

राहत अभियान के खत्म होने का यह कतई अर्थ नहीं है कि हमारा अभियान खत्म हो गया। हमने इस आपदा के बाद इस इलाके का रूख सिर्फ राहत बांटने के लिए नहीं किया था। हमारा लक्ष्य था कि हम कोसी नदी की उस समस्या को समझे जिसके कारण दो सौ किमी की चौडाई में फैला एक बडा समाज सदियों से पीडित और उपेक्षित रहा है। इसी कडी में हमने एक नई राह चुनी है। वह है इस बार के सभी बाढ पीडित गांवों की यात्रा का अभियान। हमारी यह यात्रा वराह क्षेत्र से षुरू होगी, जहां से कोसी की सात धाराएं मिलकर एक होती है और अपने मैदानी भाग की यात्रा षुरू करती है। हम अपनी यात्रा कार्तिक पूणिZमा के दिन षुरू करना चाहते हैं, जिस दिन वहां भव्य मेला लगता है और पूरे इलाके के लोग पहुंचते हैं। वहां से षुरू होकर हमारी यात्रा कोसी की नई धारा से सटे सुपौल, मधेपुरा, खगडिया, भागलपुर से होते हुए कटिहार जिले के कुरसेला नामक स्थान तक पहुंचेगी, जहां कोसी नदी गंगा से मिलती है। फिर वहां से कोसी के दूसरे किनारे पर कटिहार, मधेपुरा और अररिया जिले के प्रभावित गांवों से गुजरते हुए नेपाल की सीमा तक जाएंगे। यात्रा के दूसरे चरण में हम तटबंध के भीतर के गांवों में जाएंगे, जहां इससे पहले कोसी नदी बहा करती थी। यात्रा के दौरान हमने करीब 100 प्रभावित पंचायतों में एक-एक रात गुजराने का फैसला किया है। इस तरह हमारी यह यात्रा सौ दिनों की होगी, जो लगातार न होकर अलग-अलग चरणों में समाप्त होगी। इस यात्रा का लक्ष्य आपदा के दौरान हुई जानमाल की क्षति का आकलन, आपदा और पिछले ढाई माह में चले सरकारी और गैरसरकारी राहत कार्य का दस्तावेजीकरण, इस घटना के बाद लोगों के जीवन में आए भौगोलिक, सामजिक और आर्थिक बदलाव का पता लगाना, कोसी समस्या के समाधान को लेकर लोगों की सोच का जायजा लेना और केंद्र सरकार की सीआरएफ नीतियों का प्रचार-प्रसार करना ताकि लोगों को उनका उचित मुआवजा मिल सके।

राहत अभियान समाप्ति की ओर

मित्रों कोसी पीडितों के बीच पांच सितंबर से चल रहा हमारा राहत अभियान अब समाप्ति की ओर है। करीब-करीब सारे पीडित अपने-अपने गांव जा चुके हैं और उनके गांवों में पंचायत की ओर से नियमित तौर पर प्रतिमाह दो िक्वंण् अनाज और कुछ धनराषि का वितरण किया जा रहा है। लिहाजा अब राहत सामग्री का वितरण लोगों को निकम्मा और लालची बनाने भर ही रह जाता। हालांकि हमने सोचा था कि नवंबर महीने में हम पीडितों के बीच भारी मात्रा में गर्म कपडे बांटेंगे, मगर इस अभियान के लिए हमें पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाया। ऐसे में इस अभियान को बंद कर देना ही उचित था। मगर अत्यंत अल्प साधनों में लगभग ढाई महीने चला सिझया समांग का यह अभियान हमारे लिए यादगार रहेगा। इस दौरान हमनें सुपौल जिले के प्रतापगंज ब्लाक के दस गांवों (दुअनियां, भवानीपुर, इस्लामपुर, भेडवा, हाडाबाद, अरराहा, ब्रहमोत्रा, सुरियारी, प्रतापगंज, टेकुनाद्ध में नियमित तौर पर राहत सामगि्रयों का वितरण किया और मधेपुरा के सिंहेष्वर प्रखंड से सटे हरिाराहा, रामपुर लाही, बरियाही, भथनी, परिहारी, जिरवा, टिकुलिया, रहटा और पटोरी गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के प्रयास किये। प्रतापगंज के गांवों में हमनें षुरूआत में दिल्ली की एक संस्था की मदद से राषन किट का वितरण किया और बाद में टेंट, बरतन, दवाइयां, कंबल, बाल्टी, मच्छरदानी, टार्च, साबुन, तेल इत्यादि सामगि्रयां भी उपलब्ध कराई। इन आंकडों के इतर प्रतापगंज में चले हमारे राहत अभियान की खासियत सामगि्रयों की मात्रा न होकर उसकी संचालन पद्धति रही। उन दिनों जब सारी संस्थाएं राहत षिविरों में रहकर काम कर रही थीं। हमनें पीडित गांवों में रहकर काम करने का फैसला किया। क्योंकि पहले दिन से हमारा लक्ष्य साफ था कि हमें राहत के रूप में खैरात नहीं बांटना है, बल्कि पीडितों को कुछ इस तरह मदद करना है ताकि वे संभल जाएं। जब अधिकांष राहत अभियानों ने लोगों को पंगु बनाने के अलावा कोई खास योगदान नहीं किया। अपने इसी लक्ष्य के कारण हमनें पीडित गांवों में बस कर लोगों से जुडने और उनके दुख दर्द को समझने की कोषिष की और फिर जिस इंसान को जैसी जरूरत हुई उसे वह उपलब्ध कराने की कोषिष की। अक्सर हम बातें भी किया करते थे कि अपने अभियान के तहत जो सामग्री हम सबसे अधिक बांटेंगे वह मीठे बोल होंगे। आज भी हम लोगों में से एक या दो लोग प्रतापगंज में ही रहते हैंं और उनका काम रोज सुबह गांव में टहलना और घर-घर जाकर लोगों से मिलना उनसे बातें करना होता है। इस दौरान हमें उनके घर में जिस चीज का अभाव नजर आता है और वह चीज अगर हमारे पास होती है तो हम उन्हें वह सामान उपलब्ध करा देते हैं। षुरूआत में जरूर हमनें कूपन बांटकर सामान बंटवाए पर बाद के दिनों में हमनें भीड लगाकर सामान बंटवाने का तरीका ही बंद कर दिया। क्योंकि यह तरीका लोगों के स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाला था।उसी तरह मधेपुरा के सिंहेष्वर प्रखंड के निकटवर्ती गांवों में चला हमारा अभियान भी कुछ खास ही था। यह इलाका बाढ से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में से था और हम चाहते थे कि यहां हम सघन अभियान चला सकें। मगर प्रतापगंज के लिए तो हमें राहत सामग्री मिल रही थी, इस इलाके लिए तमाम प्रयास के बावजूद हमें आष्वासन के सिवा कुछ भी नहीं मिला। ऐसे में भोपाल और धनबाद के मित्रों द्वारा भेजी गई दवाइयां काम आईं और हमनें इन इलाकों में मेडिकल कैंप चलाने की योजना बना डाली। हमारे पास डाक्टर नहीं थे, यह एक बडी समस्या थी। पर हमारे साथी पंकज और रूपेष ने इसका भी तोड निकाल लिया। उन्होंने डाक्टर फोर यू और यूथ फार इक्वलिटी के डाक्टर साथियों को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वे अपना अधिकांष समय इन इलाकों के लिए दें। हम इस बात के लिए आभारी हैं कि अपनी संस्थाओं की नाराजगी झेलते हुए भी उन्होंने खास तौर पर डाण् लोकेष और डाण् प्रियदषZ ने इन इलाकों के लिए पर्याप्त समय दिया। इस अभियान के दौरान खीची गई तस्वीरें काफी बेहतर हैं, जिन्हें मैं ब्लाग पर उपलब्ध कराने की कोषिष करूंगा।

Tuesday, October 7, 2008

कोसी की तकदीर लिखने से पहले

हम कोसीवासी फिर उसी तिराहे पर खडे हैं, जहां तकरीबन पचपन साल पहले थे। उन दिनों जोर-शोर से बहस हुआ करती थी कि आखिर इस उच्चश्र्रंखल नदी का क्या उपाय किया जाय। इसके कोप से उत्तर बिहार के लाखों बािशंदों को कैसे बचाया जाय। क्या बराज और तटबंध के जरिये कोसी को काबू में किया जा सकता है। या बराह क्षेत्र में प्रस्तावित हाई डैम ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है। या फिर जैसा कि पर्यावरणविद कहा करते हैं, इस चंचल नदी को यूं ही छोड दिया जाय और इसके कोप से तालमेल बिठाकर जीने की कोिशश की जाय।
हालांकि हमारी सरकार ने असफल बराज और तटबंधों के बीच इस शरारती नदी को फिर से कैद करने का फैसला ले लिया है, यह जानने के बावजूद कि बराज और तटबंध 25 साल पहले ही एक्सपायर हो चुके हैं। हमारे इलाके की अच्छी खासी आबादी, खास तौर पर वे लोग जिनके इलाके में इस बार कोसी ने तबाही मचाई है सरकार के इस फैसले से सहमत नजर आते हैं। उनकी नजर में बराज कभी एक्सपायर हुआ ही नहीं। यह भीषणतम हादसा इंजीनियरों-ठेकेदारों की लापरवाही और हठधर्मिता के कारण हुआ। दरअसल इन लोगों ने बराज बनने के बाद की 50 साल की नििश्चंता को जिया है। हालांकि इस दौरान भी कई बार तटबंध टूटे और भीषण बाढें भी आईं, पर नदी के रास्ता बदलने की खतरनाक अदा से मुक्ति मिल गई थी। मगर ये लोग इस नदी के साथ आने वाली सिल्ट की भीषण समस्या से या तो अनजान हैं या किसी सुपर नेचुरल सरकारी तुक्के से इसके समाधान की उम्मीद लगा बैठे हैं। जबकि इसी गाद के कारण कई सालों से बराज नाकाम पडा है और 9 लाख क्यूसेक तक का बहाव झेल चुका तटबंध इस बार डेढ-पौने दो लाख क्यूसेक दबाव नहीें बरदास्त कर पाया। इसके बावजूद अगर सिल्ट की सफाई कराये बगैर कोसी नदी को फिर से तटबंधों के बीच से इसी बराज के रास्ते गुजारने की कोिशश की गई तो हमें और हमारी सरकार को अगले साल फिर से ऐसी तबाही के लिए तैयार रहना होगा। अगर सरकार के पास सचमुच सिल्ट की सफाई की कोई योजना है तो इसे भी सबके सामने आना चाहिए। क्योंकि बराज के अंदर इतना सिल्ट जमा हो चुका है कि जेसीबी मशीन और गाडियों के जरिये इसकी सफाई में लंबा समय लग सकता है।
इस उधेडबुन वाली स्थिति में कई लोग परमानेंट साल्यूशन के नाम पर फिर से बराह क्षेत्र में प्रस्तावित हाई डैम की वकालत करने लगे हैं। यह डैम 60-65 साल से प्रस्तावित है, मगर इस पर काम शुरू नहीं किया जा सका क्योंकि यह परियोजना काफी महंगी थी। मगर कभी इस परियोजना को नकारा नहीं गया और इसकी तुलना में बराज को हमेशा तात्कालिक समाधान ही माना जाता रहा। बराज के निर्माण के वक्त भी सबसे आशावादी विशेषज्ञ ने भी इसकी उम्र 25 साल से अधिक नहीं आंकी थी। मगर उस वक्त जिन कारणों से हाई डैम परियोजना को स्थगित कर दिया गया था वे आज भी मौजूद हैं। आज की तारीख में इस परियोजना की लागत तकरीबन 1 लाख करोड है। कहा जा रहा है कि इस परियोजना से काफी बिजली बनेगी। जापान की एक वित्तीय ऐजेंसी इसमें पैसा लगाने के लिए भी तैयार है। मगर इस डैम से उत्पादित होने वाली बिजली भी काफी महंगी होगी। इसके अलावा बराह क्षेत्र भूकंप प्रभावित जोन में पडता है, ऐसे में अगर यह हाई डैम बन भी गया तो हमेशा एक भीषण आपदा का संकट मंडराता रहेगा और वह आपदा मौजूदा आपदा से कही बडी होगी। इस डैम के बारे में एक और दीगर तथ्य यह है कि आज की तारीख में अगर इसका निर्माण शुरू करवा भी दिया जाय तो इसे पूरा होने में लगभग बीस साल का समय लगेगा। लिहाजा इस परियोजना को स्वीकारने और नकारने के बीच बहस की लंबी गुंजाइश है।
अब बांध विरोधी पर्यावरणविदों का रास्ता यानि कोसी नदी के साथ सहजीवन का प्रयास। इन लोगों का मानना है कि नदी के सिल्ट लाने की क्षमता को नकारात्मक नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इस सिल्ट के जरिये भावी पीिढयों के लिए अच्छी जमीन का निर्माण हो रहा है। इन विशेषज्ञों की यह बात भी सच है कि अगर नदी को आजाद छोड दिया जाय तो कभी इतने बडे हादसे होंगे ही नहीं। मगर यह पूरी तरह सच नहीं कि अगर सालाना बाढ से तालमेल बिठाकर जीना सीख लिया जाय तो समस्या रहेगी ही नहीं। कोसी नदी की समस्या सिर्फ बाढ की नहीं है यह इसके बारबार रास्ता बदलने और इसके बाद जमीन को परती बना देने की भी है। हर 30-35 सालों में यह रास्ता बदल लेती है, जिसके कारण जानमाल की व्यापक क्षति होती है। हालांकि लोगों को अब याद नहीे पर 1930 के आसपास जब इसने रास्ता बदला था तो सुपौल का नाथनगर कस्बा पूरी तरह तबाह हो गया था। क्या नदी के साथ सहजीवन का अर्थ यह भी है कि हमें ऐसे हादसों के लिए तैयार रहना पडेगा। ऐसे में इन इलाकों में कोई पुल नहीं होगा, कोई सडक या रेल नहीं होगी, बिजली नहीं होगी, जैसा कि कोसी नदी के दोनों तटबंधों के बीच के गांवों में आज भी हो रहा है। इक्कीसवीं सदी के विकसित भारत में ऐसे हालात में जीना कौन चाहेगा ?
ऐसा नहीं कि हम इनमें से हर उपाय से पूरी तरह असहमत हैं। दरअसल अपने जीवन की कीमत पर हमें हर उपाय अधूरा ही लगता है। खास तौर पर उन हालातोें में जब सरकार हमसे पूछे बगैर हमारी किस्मत का फैसला कर चुकी है। हमारा सिर्फ इतना कहना है कि बहस होनी चाहिए, पीडितों की राय भी ली जानी चाहिए। ऐसे में याद आता है आजादी के बाद की बिहार सरकार का वह फैसला जिसके तहत कोसी की पूरी बाढ पीडित आबादी को झारखंड के रामगढ में बसाने की योजना बनी थी। आज हम इसे तुगलकी फरमान कहकर इस पर हंस सकते हैं, मगर इस योजना में कम से कम हमलोगों के प्रति सरकार की संवेदना तो झलकती थी। आजादी के बाद लगभग आठ साल बहस चलने के बाद बराज और तटबंध के निर्माण का फैसला लिया गया, मगर इस बार सक्षम लोगों की चुप्पी बहुत अखरने वाली है।

Wednesday, October 1, 2008

पहला दौर खत्म

कोसी की प्रलयंकारी बाढ के बाद सरकारी, गैरसरकारी संस्थाएं और आम लोगों द्वारा चलाए जा रहे बचाव और राहत कार्य का एक दौर अब समाप्ति की ओर है। बाढ के लगभग चालीस दिन बीच चुके हैं, इस दौरान आम लोगों के समूह, सेना के जवान, कुछ स्वयंसेवी संस्था, राजनीतिक दल और सरकार ने मिलकर जो काम किया है वह नििष्चत तौर पर अद्वितीय है। हालांकि इस बीच नाव के डूबने से, हैजा और डायरिया जैसी बीमारियों से, सांप काटने से और अन्य कई छोटी-बडी वजहों से बडी संख्या में लोगों ने जान गवाई है और गंवा रहे है। जबकि एक सक्षम प्रषासन इन मौतों पर जाहिर तौर पर काबू कर सकता था। क्योंकि एक बार आपदा सिर पर आ जाने के बाद हमें यह मालूम था कि यह सब हो सकता है। ये मौतें तटबंध के टूटने या नदी के धारा पलटने जैसी अप्रत्याषित घटना नहीं थी। मगर संभवत: इस आपदा के बाद कई दिनों तक प्रषासन खुद सदमें में रहा और ऐसा लगने लगा कि चीजें खुद बखुद उसके हाथ से निकलती जा रही है। इस बीच उसने मेगा कैंप लगाने जैसे कुछ असफल प्रयोग भी किए। मगर अंतत: प्रति परिवार एक िक्वंटल अनाज और 2250 रूपये नकद देने की उसकी योजना काफी सफल साबित हुई और खिचडी खिलाने की अधकचरी कोषिषों पर विराम लग गया। बहरहाल यहां मैं इस दौर में सरकार की सफलता-असफलता का जायजा लेने नहीं बल्कि इस पूरे दौर का विवरण देने की कोषिष में हूं। ताकि यह तय किया जा सके कि राहत और पुनर्वास का अगला दौर चलाया जाय या नहीं अगर चलाया जाए तो किस तरह।हर आपदा की तरह इस बार भी बचाव और राहत के इस दौर की बागडोर सबसे पहले स्थानीय लोगों ने थामी। बाढ का पानी तबाही मचाने के लिए जब गांवों में घुसने लगा तो लोग बदहवास हालत में स्थानीय कस्बों की ओर भागे। इस बार जिन इलाकों में पानी आया था वहां के लोगों ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी बाढ देखी ही नहीं थी और उनका सामना ऐसी बाढ से हुआ जो संभवत: कोसी नदी के जीवन की सबसे खतरनाक बाढ थी। प्रत्यक्षदषीZ बताते हैं कि पानी का रेला अक्सर आठ-आठ, दस-दस फुट का होता था और उसकी गति भी सौ किमी प्रतिघंटा के लगभग होती थी। ऐसे में वही लोग बच पाए जो या तो समय रहते उंचे स्थान पर चले गए या पानी देख सबकुछ छोडकर पूरब या पिष्चम दिषा की ओर भागे। पहले तीन-चार दिन तो बाढ किसी आतंक की तरह छाया रहा। पीिZडत इलाकों से बाहर निकलने वाले लोग न तो कुछ बोल पाते न ही ठीक से खा-पी या सो ही पाते। बडी संख्या में लोगों ने खुद को पागलपन के दौर से गुजरता हुआ पाया। हमारे साथी विनय तरूण को भागलपुर में एक ऐसा व्यक्ति मिला जो किसी उंचे पहाड पर जाना चाहता था। जबकि भागलपुर खुद बाढग्रस्त इलाके से 50-60 किमी दूर है। उस दौर में स्थानीय लोगों ने चंदाकर खानेपीने और लोगों को ठहराने का अभूतपूर्व काम किया। क्योंकि उस वक्त न तो सरकार सजग हुई थी और न ही संस्थाएं पहुंची थीं। सुपौल जिले के सिमराही कस्बे में हर आदमी चंदा देता और अपने घर से खाना भी लाता। लोगों ने बताया कि उस वक्त रिक्षावाले भी दिन भर की कमाई का आधा चंदे में देने लगे थे। प्रतापगंज ब्लाक के दुअनियां गांव के राजकिषोर भगत नामक एक दुकानदार ने अपने पैसे से पंद्रह दिनों तक लोगों को चाय, सत्तू और पानी पिलाया। मेरी जानकारी में ये दो उदाहरण हैं मगर ऐसे न जाने कितने प्रयास हुए उसका कोई लेखाजोखा नहीं है। मगर इस में कोई मतभेद नहीं है कि कोसी की चपेट में जो लोग नहीं आए वे भूख और बदहवासी से मर जाते अगर स्थानीय लोगों ने उन्हें सहारा नहीं दिया होता। इस लिए मेरे हिसाब से इस दौर के सरताज यही लोग हैं। दूसरा नंबर मैं सेना के जवानों को दूंगा जिन्होंने उफनती कोसी की लहरों की सवारी करने का जोखिम उठाया और छतों, छप्परों, नहरों और अन्य जगहों पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे लोगों को बचाकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। जो लोग अपने घरों को छोडने के लिए तैयार नहीं थे उनतक राहत और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाई और तब तक डटे रहे जबतक पानी काबू में नहीं आने लगा। जैसा कि मैं पहले ही जिक्र कर चुका हूं, स्थानीय प्रषासन लगभग एक महीने तक सदमें की स्थिति में रहा और इस बीच में उसने जो कुछ किया उसका कोई असर नहीं रहा। स्थानीय लोगों की पहले भी लगभग दस दिन के बाद दम तोडने लगी थी। इस बीच करीब बीस दिनों तक मोरचा स्वयंसेवी संस्थाओं और फंडिंग एजेंसियों ने संभाला। नहरों-सडकों और स्कूलों-कालेजों में फैले बाढ पीडितों के लिए खाना उपलब्ध कराया। उन्हें टेंट, अनाज, कपडे, बरतन, साफ पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य जरूरी चीजें उपलब्ध कराईं। जारी

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