Monday, September 8, 2008

सिमराही, सुपौल- 6 सितंबर

महामारी-हादसे, किसको पता कितने मरे
बेलही गांव के पास फोरलेन हाइवे पर लगे विषाल राहत षिविर को पार करने के बाद हमलोग एक कटाव पारकर दुअनिया गांव तक पहुंचे थे( सामने एक और कटाव था। षाम गहराने लगी थी हम तय ही कर रहे थे कि इस कटाव के पार जाएं या न जाएं तभी कटाव के उसपार से लोगों का एक रेला आता नजर आया। मर्दों के सिर पर बोरे जिनमें घर चलाने लायक कुछ दिन का सामान होगा, औरतों के गोद में बच्चे, तन पर बहुत कम कपडे, चेहरे पर बौखलाहट। प्रैिक्सस संस्था के साथी अनिंद्यो बनजीZ के मुंह से हठात निकल पडा- यह तो बटबारे के बाद हुए विस्थापन जैसा नजारा है। उस जत्थे में आने वाले एक बूढे ने जैसे ही धरती पर पांव रखा उसकी नजर हमारी ओर पडी। वह बोल उठा- दोसरे जनम भेटल। यानी दूसरा जन्म हुआ। हमारे पूछने पर उन्होंने बताया कि यहां से आठ-नौ किलमीटर दूर परयाही-लालगंज गांव से आ रहे हैं, प्राइवेट नाव से सुबह छह बजे के चले हैं, अभी सांझ में पहुंचे हैं। दरअसल यह गांव कोसी की तत्कालीन मुख्य धारा के उस पार है। गांव चारो ओर भीषण बाढ से घिरा है। बस पांच बीघे का एक प्लाट डूबने से बचा हुआ है, जिस पर आसपास के चार गांव के लोग किसी तरह रह रहे हैै, मगर अब वहां रहना भी खतरनाक हो गया है, पिछले तीन-चार दिन से जबरदस्त बिमारी फेल गई है। एक उल्टी, एक पैखाना में लोग दम तोड दे रहे हैं। रोज चार से पांच लोग मर रहे हैं। उनकी बातें सुनकर हमारी रूह कांप गई। खबर तो हमें भी थी कि महामारी फेल रही है पर इतनी भीषण यह अंदाजा हमें नहीं था, परयाही-लालगंज जैसे न जाने कितने गांव सुपौल, मधेपुरा और अररिया जिले में हैं, जहां अब भी लोग भीषण बाढ में रह रहे हैं, उन गांवों में क्या हो रहा होगा किसी को पता नहीं। सच तो यह है कि बाढ के 19वें दिन भी मरने वालों की सुध लेने वाला कोई नहीं, कितने मरे यह जानना नामुमकिन है। बलुआ जैसे कुछ गांव के लोग कहंा हैं यह किसी को नहीं मालूम, वे किसी राहत षिविर में नजर नहीं आते। मधेपुरा की स्थिति तो सबसे भीषण है, संस्थाओं के लोग भी पानी उतरने का इंतजार कर रहे हैं, लोगों को उनके ही भरोसे कोसी के कोप का मुकाबला करने के लिए छोड दिया गया है। परयाही-लालगंज गांव से आने वाले लोगों में कई हैजा और डायरिया के षिकार थे। उन्हें तत्काल आमीZ के हैल्थ कैंप में भरती कराया गया। पूरे इलाके में भीषण हैजा, डायरिया फेल गया है, सारे अस्पताल और निजी नर्सिंग होम ऐसे मरीजों से पटे हैं। एक प्राइवेट डाक्टर ने तो कॉलरा फेलने की भी आषंका जता दी। इस इलाके में पहले भी कालरा के मरीज मिलते रहे हैं। मगर इस महामारी से मुकाबले की तैयारी बिल्कुल नहीं है। प्रषासन कह रहा है उनके पास बहुत कम डाक्टर हैं। सुपौल जिले में डायरिया, हैजा और सांप कांटने की दवा बहुत कम है। हेल्प-एज इंडिया की टीम मोबाइल क्लीनिक के साथ पहुंचे हैं, मगर उनके पास भी न डाक्टर हैं, न ही उपयुक्त दवाइयां। हमनें अपने स्तर पर दरभंगा मेडिकल कालेज के पीजी के कुछ विद्यार्थियों को बुलाया है और दवाइयों का भी इंतजाम करने में जुटे हैं मगर षिविर लगाने लायक संसाधन हमारे पास नहीं। उम्मीद है कहीं न कहीं से कुछ इंतजाम होगा।
एजेंसियों के नाम पर सिर्फ ओक्सफेम
अनिंद्यो बता रहे थे सुनामी के बाद नागापटटनम में राहत और पुनर्वास के लिए दस हजार के करीब फंडिंग एजेंसियां काम कर रही थीं। उनमें से कई तो दूसरे देषों की थीं। मगर इस इलाके में सुनियोजित तरीके से सिर्फ एक फंडिंग एजेंसी ओक्सफेम काम कर रही है। बेलही में इस संस्था ने एक बडा राहत षिविर लगाया है, जिसमें वे 600 परिवारों के रहने और खाने पीने की व्यवस्था कर रहे हैं। इसके अलावा यह संस्था भीमनगर में भी पीडित परिवारों के बीच सर्वे करवा रही है। वहां भी ऐसे ही कैंप लगाने की योजना है। कैंप में वे फिलहाल टेंट, चटाई, चूडा, सत्तू, बाल्टी, मग, हेलोजेन, फिटकिरी, ओआरएस घोल बंटवा रहे हैं। मगर जब विस्थापितोें की संख्या 30 लाख के पार हो तो ऐसे प्रयास प्यासे को ओस चटाने के बराबर हैै। जरूरत है ऐसे ही हजारो सुसंगठित प्रयास की। बांकी संस्थाएं तो अभी खिचडी बटवाने में ही जुटी है। सरकारी षिविरों में भी कोई सुनियोजित व्यवस्था नहीं। इसके अलावा महिला स्वयंसेवकों की भारी कमी है। हेल्प-एज इंडिया, पीजीवीएस, प्रैिक्सस, यूनिसेफ, एक्षनएड, कासा जैसी कुछ एजेंसियां अभी हालात का जायजा ले रहीे हैं और निकट भविष्य में काम शुरू करने की तैयारी में है।
साहिल पर खडे होकर लहरें गिनने का फैषन
बेलही के कैंप में ओक्सफेम अच्छा काम कर रही हैं, इसके अलावा कई समितियां भी वहां राहत बंटवा रही हैं, मगर वहां से दो किलोमीटर दूर दुअनियां गांव में लगे राहत षिविरों की सुध लेने वाला कोई नहीं। वजह है वहां पहुंचने के लिए पानी के दो-तीन कटाव पार करने पडते है। लिहाजा कोई संस्था वहां काम करने में उत्सुक नहीं। संस्थाएं और समितियां बडे उत्साह से राहत सामगि्रयां लेकर बाढ पीडित इलाकों में पहुंचती हैं और किनारे पर रह रहे पीडितों में बांट कर लौट जाती हैैं। अगर वे थोडी सी मेहनत करें, पानी में उतरने का साहस दिखाएं तो संभव है कई अन्य पीडितों को भी राहत मिल पाएगी।
मुक्ता के बोल
प्रैिक्सस की साथी मुक्ता ने आज मुझे एक नारा दिया है- बाढ पीडितों के बीच भूखे मर जाना कहीं अच्छा है बनिस्पत जीवन भर इस ग्लानि से मरने के कि हमने अपनी नजरों के सामने दम तोड रहे लोगों के लिए कुछ नहीं किया। यह नारा हमेषा हम जैसे लोगों को हिम्मत देगा।

2 Comments:

Anonymous said...

kosi ka kahar dekh kar man vichlit ho gaya hai.

Anonymous said...

Kosi ka kahar dekh kar man vichlit ho gaya. Jeevan dene wala jal bhi maut ka karan ban sakta hai ek bar phir se dekhne ko mila hai. pani utar raha hai aane wale kuch dino me aur bhi utar jayega, yani media jo aaj bihar par focus kar raha hai phir se kuch naya dikhane ke liye tayyar ho jayega, lekin pani utarne ke bad jo samsyaye khadi hogi unse waha ke log akele kaise nibtege soch kar man aur vichlit ho jata hai. samsyaye to ab aane wali hi. pani utarne ke bad sthiti aur kharab hone wali hai aur jan kar tajub hota hai ki abhi tak sarkari aur gair sarkari jo prayas ho rahe hai wo nakafi hi nahi balki utha ke muh me jeera ke saman hai. ek bade star par lambe samay ki planning ke sath kuch jameeni kam shuru hona chahiye...
mere star par jo bhi sambhav hoga nichit taur par karuga.
Bihar hi es samasya par pura desh aapke ke sath hai.

Ashutosh,
Jaipur Rajasthan, 9887097531

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