Wednesday, December 17, 2008

घर मिला, पर जिंदगी नहीं

इस बात को चार महीने हो गये. अ।र्थिक मंदी और मुंबई पर हुए हमले ने सब कुछ भुला दिया. कोसी के कहर के मारे लाखों लोगों के अ।ंसूं, उनकी अ।ंखों में ही ठहरे हैं. अब उनकी सिसकियों को सुनने वाला कोई नहीं. हमने अपने अभियान की शुरुअ।त मधेपुरा से करीब 12 किमी दूर शंकरपुर ब्लाक के सोनवषार् पंचायत से की.इन चार महीनों में भले ही दुनिया में बहुत कुछ बदल गया हो, यहां के लोगों का ददर् वही है. वे अपने घरों को तो लौट अ।ये हैं, लेकिन उनकी जिंदगी नहीं बदली. उनके खेत खलिहानों में अब भी एक से ढाई फीट तक पानी जमा है. गांव की सडकें व घरों पर से तो पानी निकल गया है, लेकिन एक मुक्कमल जिंदगी जीने के लिए यह काफी नहीं. जहां तक नजरें जाती हैं, अब भी पानी ही दिखता है. खेतों में पानी जमा होने के कारण धान की फसल हुई नहीं, अगले कई माह तक किसी तरह की पैदावार हो सके, एेसा मुमिकन नहीं दिखता. बाढ के समय जो सरकारी सहायता मिली, दाना दाना गिनकर खचर् करने के बावजूद अब खाने के लाले हैं. सरकारी राहत के तौर पर गांव में हर परिवार को एक िक्वंटल चावल और 2250 रुपये नगद दिये गये थे. यह सहायता कम से कम तीन माह तक दी जानी थी, लेकिन एक बार जाने के बाद सरकारी हुक्मरानों ने दुबारा इस गांव का रुख नहीं किया. इस पंचायत के सात लोगों ने बाढ में अपनी जान गंवायी. प्रशासन ने उनके पिरवारों को एक एक लाख के मुआवजे की घोषणा तो कर दी, पर मिला सिफर् एक को. इस पंचायत के लोग थोडे से इस मामले में भाग्यशाली रहे कि कोसी तटबंध के टूटने के आठ दिनों बाद यहां पानी घुसा. इस बीच लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का मौका मिल गया. अपनी जिंदगी भर की गाढी कमाई को भगवान भरोसे छोड यहां के लोगों ने लालपुर हाइस्कूल में शरण ली. पानी बढा तो इन्हें सिंहेश्वर, लालपुर, हरदी, सहरसा के राहत कैंपों की ओर रुख करना पडा. करीब महीने भर बाद ये अपने घर लौटे और तब शुरू हुई फिर से जिंदगी शुरू करने की जद्दोजहद. वल्डर् विजन, राम कृष्ण मिशन, एपी कोडर् ने रिलीफ बांटी. लालपुर, सरोपट्टी, सिंहेश्वर अ।दि गांव के लोंगों ने यहां अ।कर राहत साम्रगी भी बांटी.पर इतना काफी नहीं है. इतनी बडी प्रभावित अ।ब।दी के लिए एक सक्षम मसीनरी का होना जरूरी है. वह सरकार के पास है. पर उसका उपयोग वह कर नहीं पा रही और बाढ पीडितों को उनके हाल पर छोड दिया गया

साइबेरियन पक्षियों ने किया रुख
एक विशाल भूभाग में पानी भर जाने से किसी और को फायदा हुअ। हो या नहीं, साइबेरियन पक्षियों को एक और शरणस्थली मिल गयी है. जो गिद्ध इस इलाके से विलुप्त हो चले थे, अब फिर से दिखने लगे हैं.

Tuesday, November 4, 2008

नई राह पर

राहत अभियान के खत्म होने का यह कतई अर्थ नहीं है कि हमारा अभियान खत्म हो गया। हमने इस आपदा के बाद इस इलाके का रूख सिर्फ राहत बांटने के लिए नहीं किया था। हमारा लक्ष्य था कि हम कोसी नदी की उस समस्या को समझे जिसके कारण दो सौ किमी की चौडाई में फैला एक बडा समाज सदियों से पीडित और उपेक्षित रहा है। इसी कडी में हमने एक नई राह चुनी है। वह है इस बार के सभी बाढ पीडित गांवों की यात्रा का अभियान। हमारी यह यात्रा वराह क्षेत्र से षुरू होगी, जहां से कोसी की सात धाराएं मिलकर एक होती है और अपने मैदानी भाग की यात्रा षुरू करती है। हम अपनी यात्रा कार्तिक पूणिZमा के दिन षुरू करना चाहते हैं, जिस दिन वहां भव्य मेला लगता है और पूरे इलाके के लोग पहुंचते हैं। वहां से षुरू होकर हमारी यात्रा कोसी की नई धारा से सटे सुपौल, मधेपुरा, खगडिया, भागलपुर से होते हुए कटिहार जिले के कुरसेला नामक स्थान तक पहुंचेगी, जहां कोसी नदी गंगा से मिलती है। फिर वहां से कोसी के दूसरे किनारे पर कटिहार, मधेपुरा और अररिया जिले के प्रभावित गांवों से गुजरते हुए नेपाल की सीमा तक जाएंगे। यात्रा के दूसरे चरण में हम तटबंध के भीतर के गांवों में जाएंगे, जहां इससे पहले कोसी नदी बहा करती थी। यात्रा के दौरान हमने करीब 100 प्रभावित पंचायतों में एक-एक रात गुजराने का फैसला किया है। इस तरह हमारी यह यात्रा सौ दिनों की होगी, जो लगातार न होकर अलग-अलग चरणों में समाप्त होगी। इस यात्रा का लक्ष्य आपदा के दौरान हुई जानमाल की क्षति का आकलन, आपदा और पिछले ढाई माह में चले सरकारी और गैरसरकारी राहत कार्य का दस्तावेजीकरण, इस घटना के बाद लोगों के जीवन में आए भौगोलिक, सामजिक और आर्थिक बदलाव का पता लगाना, कोसी समस्या के समाधान को लेकर लोगों की सोच का जायजा लेना और केंद्र सरकार की सीआरएफ नीतियों का प्रचार-प्रसार करना ताकि लोगों को उनका उचित मुआवजा मिल सके।

राहत अभियान समाप्ति की ओर

मित्रों कोसी पीडितों के बीच पांच सितंबर से चल रहा हमारा राहत अभियान अब समाप्ति की ओर है। करीब-करीब सारे पीडित अपने-अपने गांव जा चुके हैं और उनके गांवों में पंचायत की ओर से नियमित तौर पर प्रतिमाह दो िक्वंण् अनाज और कुछ धनराषि का वितरण किया जा रहा है। लिहाजा अब राहत सामग्री का वितरण लोगों को निकम्मा और लालची बनाने भर ही रह जाता। हालांकि हमने सोचा था कि नवंबर महीने में हम पीडितों के बीच भारी मात्रा में गर्म कपडे बांटेंगे, मगर इस अभियान के लिए हमें पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाया। ऐसे में इस अभियान को बंद कर देना ही उचित था। मगर अत्यंत अल्प साधनों में लगभग ढाई महीने चला सिझया समांग का यह अभियान हमारे लिए यादगार रहेगा। इस दौरान हमनें सुपौल जिले के प्रतापगंज ब्लाक के दस गांवों (दुअनियां, भवानीपुर, इस्लामपुर, भेडवा, हाडाबाद, अरराहा, ब्रहमोत्रा, सुरियारी, प्रतापगंज, टेकुनाद्ध में नियमित तौर पर राहत सामगि्रयों का वितरण किया और मधेपुरा के सिंहेष्वर प्रखंड से सटे हरिाराहा, रामपुर लाही, बरियाही, भथनी, परिहारी, जिरवा, टिकुलिया, रहटा और पटोरी गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के प्रयास किये। प्रतापगंज के गांवों में हमनें षुरूआत में दिल्ली की एक संस्था की मदद से राषन किट का वितरण किया और बाद में टेंट, बरतन, दवाइयां, कंबल, बाल्टी, मच्छरदानी, टार्च, साबुन, तेल इत्यादि सामगि्रयां भी उपलब्ध कराई। इन आंकडों के इतर प्रतापगंज में चले हमारे राहत अभियान की खासियत सामगि्रयों की मात्रा न होकर उसकी संचालन पद्धति रही। उन दिनों जब सारी संस्थाएं राहत षिविरों में रहकर काम कर रही थीं। हमनें पीडित गांवों में रहकर काम करने का फैसला किया। क्योंकि पहले दिन से हमारा लक्ष्य साफ था कि हमें राहत के रूप में खैरात नहीं बांटना है, बल्कि पीडितों को कुछ इस तरह मदद करना है ताकि वे संभल जाएं। जब अधिकांष राहत अभियानों ने लोगों को पंगु बनाने के अलावा कोई खास योगदान नहीं किया। अपने इसी लक्ष्य के कारण हमनें पीडित गांवों में बस कर लोगों से जुडने और उनके दुख दर्द को समझने की कोषिष की और फिर जिस इंसान को जैसी जरूरत हुई उसे वह उपलब्ध कराने की कोषिष की। अक्सर हम बातें भी किया करते थे कि अपने अभियान के तहत जो सामग्री हम सबसे अधिक बांटेंगे वह मीठे बोल होंगे। आज भी हम लोगों में से एक या दो लोग प्रतापगंज में ही रहते हैंं और उनका काम रोज सुबह गांव में टहलना और घर-घर जाकर लोगों से मिलना उनसे बातें करना होता है। इस दौरान हमें उनके घर में जिस चीज का अभाव नजर आता है और वह चीज अगर हमारे पास होती है तो हम उन्हें वह सामान उपलब्ध करा देते हैं। षुरूआत में जरूर हमनें कूपन बांटकर सामान बंटवाए पर बाद के दिनों में हमनें भीड लगाकर सामान बंटवाने का तरीका ही बंद कर दिया। क्योंकि यह तरीका लोगों के स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाला था।उसी तरह मधेपुरा के सिंहेष्वर प्रखंड के निकटवर्ती गांवों में चला हमारा अभियान भी कुछ खास ही था। यह इलाका बाढ से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में से था और हम चाहते थे कि यहां हम सघन अभियान चला सकें। मगर प्रतापगंज के लिए तो हमें राहत सामग्री मिल रही थी, इस इलाके लिए तमाम प्रयास के बावजूद हमें आष्वासन के सिवा कुछ भी नहीं मिला। ऐसे में भोपाल और धनबाद के मित्रों द्वारा भेजी गई दवाइयां काम आईं और हमनें इन इलाकों में मेडिकल कैंप चलाने की योजना बना डाली। हमारे पास डाक्टर नहीं थे, यह एक बडी समस्या थी। पर हमारे साथी पंकज और रूपेष ने इसका भी तोड निकाल लिया। उन्होंने डाक्टर फोर यू और यूथ फार इक्वलिटी के डाक्टर साथियों को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वे अपना अधिकांष समय इन इलाकों के लिए दें। हम इस बात के लिए आभारी हैं कि अपनी संस्थाओं की नाराजगी झेलते हुए भी उन्होंने खास तौर पर डाण् लोकेष और डाण् प्रियदषZ ने इन इलाकों के लिए पर्याप्त समय दिया। इस अभियान के दौरान खीची गई तस्वीरें काफी बेहतर हैं, जिन्हें मैं ब्लाग पर उपलब्ध कराने की कोषिष करूंगा।

Tuesday, October 7, 2008

कोसी की तकदीर लिखने से पहले

हम कोसीवासी फिर उसी तिराहे पर खडे हैं, जहां तकरीबन पचपन साल पहले थे। उन दिनों जोर-शोर से बहस हुआ करती थी कि आखिर इस उच्चश्र्रंखल नदी का क्या उपाय किया जाय। इसके कोप से उत्तर बिहार के लाखों बािशंदों को कैसे बचाया जाय। क्या बराज और तटबंध के जरिये कोसी को काबू में किया जा सकता है। या बराह क्षेत्र में प्रस्तावित हाई डैम ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है। या फिर जैसा कि पर्यावरणविद कहा करते हैं, इस चंचल नदी को यूं ही छोड दिया जाय और इसके कोप से तालमेल बिठाकर जीने की कोिशश की जाय।
हालांकि हमारी सरकार ने असफल बराज और तटबंधों के बीच इस शरारती नदी को फिर से कैद करने का फैसला ले लिया है, यह जानने के बावजूद कि बराज और तटबंध 25 साल पहले ही एक्सपायर हो चुके हैं। हमारे इलाके की अच्छी खासी आबादी, खास तौर पर वे लोग जिनके इलाके में इस बार कोसी ने तबाही मचाई है सरकार के इस फैसले से सहमत नजर आते हैं। उनकी नजर में बराज कभी एक्सपायर हुआ ही नहीं। यह भीषणतम हादसा इंजीनियरों-ठेकेदारों की लापरवाही और हठधर्मिता के कारण हुआ। दरअसल इन लोगों ने बराज बनने के बाद की 50 साल की नििश्चंता को जिया है। हालांकि इस दौरान भी कई बार तटबंध टूटे और भीषण बाढें भी आईं, पर नदी के रास्ता बदलने की खतरनाक अदा से मुक्ति मिल गई थी। मगर ये लोग इस नदी के साथ आने वाली सिल्ट की भीषण समस्या से या तो अनजान हैं या किसी सुपर नेचुरल सरकारी तुक्के से इसके समाधान की उम्मीद लगा बैठे हैं। जबकि इसी गाद के कारण कई सालों से बराज नाकाम पडा है और 9 लाख क्यूसेक तक का बहाव झेल चुका तटबंध इस बार डेढ-पौने दो लाख क्यूसेक दबाव नहीें बरदास्त कर पाया। इसके बावजूद अगर सिल्ट की सफाई कराये बगैर कोसी नदी को फिर से तटबंधों के बीच से इसी बराज के रास्ते गुजारने की कोिशश की गई तो हमें और हमारी सरकार को अगले साल फिर से ऐसी तबाही के लिए तैयार रहना होगा। अगर सरकार के पास सचमुच सिल्ट की सफाई की कोई योजना है तो इसे भी सबके सामने आना चाहिए। क्योंकि बराज के अंदर इतना सिल्ट जमा हो चुका है कि जेसीबी मशीन और गाडियों के जरिये इसकी सफाई में लंबा समय लग सकता है।
इस उधेडबुन वाली स्थिति में कई लोग परमानेंट साल्यूशन के नाम पर फिर से बराह क्षेत्र में प्रस्तावित हाई डैम की वकालत करने लगे हैं। यह डैम 60-65 साल से प्रस्तावित है, मगर इस पर काम शुरू नहीं किया जा सका क्योंकि यह परियोजना काफी महंगी थी। मगर कभी इस परियोजना को नकारा नहीं गया और इसकी तुलना में बराज को हमेशा तात्कालिक समाधान ही माना जाता रहा। बराज के निर्माण के वक्त भी सबसे आशावादी विशेषज्ञ ने भी इसकी उम्र 25 साल से अधिक नहीं आंकी थी। मगर उस वक्त जिन कारणों से हाई डैम परियोजना को स्थगित कर दिया गया था वे आज भी मौजूद हैं। आज की तारीख में इस परियोजना की लागत तकरीबन 1 लाख करोड है। कहा जा रहा है कि इस परियोजना से काफी बिजली बनेगी। जापान की एक वित्तीय ऐजेंसी इसमें पैसा लगाने के लिए भी तैयार है। मगर इस डैम से उत्पादित होने वाली बिजली भी काफी महंगी होगी। इसके अलावा बराह क्षेत्र भूकंप प्रभावित जोन में पडता है, ऐसे में अगर यह हाई डैम बन भी गया तो हमेशा एक भीषण आपदा का संकट मंडराता रहेगा और वह आपदा मौजूदा आपदा से कही बडी होगी। इस डैम के बारे में एक और दीगर तथ्य यह है कि आज की तारीख में अगर इसका निर्माण शुरू करवा भी दिया जाय तो इसे पूरा होने में लगभग बीस साल का समय लगेगा। लिहाजा इस परियोजना को स्वीकारने और नकारने के बीच बहस की लंबी गुंजाइश है।
अब बांध विरोधी पर्यावरणविदों का रास्ता यानि कोसी नदी के साथ सहजीवन का प्रयास। इन लोगों का मानना है कि नदी के सिल्ट लाने की क्षमता को नकारात्मक नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इस सिल्ट के जरिये भावी पीिढयों के लिए अच्छी जमीन का निर्माण हो रहा है। इन विशेषज्ञों की यह बात भी सच है कि अगर नदी को आजाद छोड दिया जाय तो कभी इतने बडे हादसे होंगे ही नहीं। मगर यह पूरी तरह सच नहीं कि अगर सालाना बाढ से तालमेल बिठाकर जीना सीख लिया जाय तो समस्या रहेगी ही नहीं। कोसी नदी की समस्या सिर्फ बाढ की नहीं है यह इसके बारबार रास्ता बदलने और इसके बाद जमीन को परती बना देने की भी है। हर 30-35 सालों में यह रास्ता बदल लेती है, जिसके कारण जानमाल की व्यापक क्षति होती है। हालांकि लोगों को अब याद नहीे पर 1930 के आसपास जब इसने रास्ता बदला था तो सुपौल का नाथनगर कस्बा पूरी तरह तबाह हो गया था। क्या नदी के साथ सहजीवन का अर्थ यह भी है कि हमें ऐसे हादसों के लिए तैयार रहना पडेगा। ऐसे में इन इलाकों में कोई पुल नहीं होगा, कोई सडक या रेल नहीं होगी, बिजली नहीं होगी, जैसा कि कोसी नदी के दोनों तटबंधों के बीच के गांवों में आज भी हो रहा है। इक्कीसवीं सदी के विकसित भारत में ऐसे हालात में जीना कौन चाहेगा ?
ऐसा नहीं कि हम इनमें से हर उपाय से पूरी तरह असहमत हैं। दरअसल अपने जीवन की कीमत पर हमें हर उपाय अधूरा ही लगता है। खास तौर पर उन हालातोें में जब सरकार हमसे पूछे बगैर हमारी किस्मत का फैसला कर चुकी है। हमारा सिर्फ इतना कहना है कि बहस होनी चाहिए, पीडितों की राय भी ली जानी चाहिए। ऐसे में याद आता है आजादी के बाद की बिहार सरकार का वह फैसला जिसके तहत कोसी की पूरी बाढ पीडित आबादी को झारखंड के रामगढ में बसाने की योजना बनी थी। आज हम इसे तुगलकी फरमान कहकर इस पर हंस सकते हैं, मगर इस योजना में कम से कम हमलोगों के प्रति सरकार की संवेदना तो झलकती थी। आजादी के बाद लगभग आठ साल बहस चलने के बाद बराज और तटबंध के निर्माण का फैसला लिया गया, मगर इस बार सक्षम लोगों की चुप्पी बहुत अखरने वाली है।

Wednesday, October 1, 2008

पहला दौर खत्म

कोसी की प्रलयंकारी बाढ के बाद सरकारी, गैरसरकारी संस्थाएं और आम लोगों द्वारा चलाए जा रहे बचाव और राहत कार्य का एक दौर अब समाप्ति की ओर है। बाढ के लगभग चालीस दिन बीच चुके हैं, इस दौरान आम लोगों के समूह, सेना के जवान, कुछ स्वयंसेवी संस्था, राजनीतिक दल और सरकार ने मिलकर जो काम किया है वह नििष्चत तौर पर अद्वितीय है। हालांकि इस बीच नाव के डूबने से, हैजा और डायरिया जैसी बीमारियों से, सांप काटने से और अन्य कई छोटी-बडी वजहों से बडी संख्या में लोगों ने जान गवाई है और गंवा रहे है। जबकि एक सक्षम प्रषासन इन मौतों पर जाहिर तौर पर काबू कर सकता था। क्योंकि एक बार आपदा सिर पर आ जाने के बाद हमें यह मालूम था कि यह सब हो सकता है। ये मौतें तटबंध के टूटने या नदी के धारा पलटने जैसी अप्रत्याषित घटना नहीं थी। मगर संभवत: इस आपदा के बाद कई दिनों तक प्रषासन खुद सदमें में रहा और ऐसा लगने लगा कि चीजें खुद बखुद उसके हाथ से निकलती जा रही है। इस बीच उसने मेगा कैंप लगाने जैसे कुछ असफल प्रयोग भी किए। मगर अंतत: प्रति परिवार एक िक्वंटल अनाज और 2250 रूपये नकद देने की उसकी योजना काफी सफल साबित हुई और खिचडी खिलाने की अधकचरी कोषिषों पर विराम लग गया। बहरहाल यहां मैं इस दौर में सरकार की सफलता-असफलता का जायजा लेने नहीं बल्कि इस पूरे दौर का विवरण देने की कोषिष में हूं। ताकि यह तय किया जा सके कि राहत और पुनर्वास का अगला दौर चलाया जाय या नहीं अगर चलाया जाए तो किस तरह।हर आपदा की तरह इस बार भी बचाव और राहत के इस दौर की बागडोर सबसे पहले स्थानीय लोगों ने थामी। बाढ का पानी तबाही मचाने के लिए जब गांवों में घुसने लगा तो लोग बदहवास हालत में स्थानीय कस्बों की ओर भागे। इस बार जिन इलाकों में पानी आया था वहां के लोगों ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी बाढ देखी ही नहीं थी और उनका सामना ऐसी बाढ से हुआ जो संभवत: कोसी नदी के जीवन की सबसे खतरनाक बाढ थी। प्रत्यक्षदषीZ बताते हैं कि पानी का रेला अक्सर आठ-आठ, दस-दस फुट का होता था और उसकी गति भी सौ किमी प्रतिघंटा के लगभग होती थी। ऐसे में वही लोग बच पाए जो या तो समय रहते उंचे स्थान पर चले गए या पानी देख सबकुछ छोडकर पूरब या पिष्चम दिषा की ओर भागे। पहले तीन-चार दिन तो बाढ किसी आतंक की तरह छाया रहा। पीिZडत इलाकों से बाहर निकलने वाले लोग न तो कुछ बोल पाते न ही ठीक से खा-पी या सो ही पाते। बडी संख्या में लोगों ने खुद को पागलपन के दौर से गुजरता हुआ पाया। हमारे साथी विनय तरूण को भागलपुर में एक ऐसा व्यक्ति मिला जो किसी उंचे पहाड पर जाना चाहता था। जबकि भागलपुर खुद बाढग्रस्त इलाके से 50-60 किमी दूर है। उस दौर में स्थानीय लोगों ने चंदाकर खानेपीने और लोगों को ठहराने का अभूतपूर्व काम किया। क्योंकि उस वक्त न तो सरकार सजग हुई थी और न ही संस्थाएं पहुंची थीं। सुपौल जिले के सिमराही कस्बे में हर आदमी चंदा देता और अपने घर से खाना भी लाता। लोगों ने बताया कि उस वक्त रिक्षावाले भी दिन भर की कमाई का आधा चंदे में देने लगे थे। प्रतापगंज ब्लाक के दुअनियां गांव के राजकिषोर भगत नामक एक दुकानदार ने अपने पैसे से पंद्रह दिनों तक लोगों को चाय, सत्तू और पानी पिलाया। मेरी जानकारी में ये दो उदाहरण हैं मगर ऐसे न जाने कितने प्रयास हुए उसका कोई लेखाजोखा नहीं है। मगर इस में कोई मतभेद नहीं है कि कोसी की चपेट में जो लोग नहीं आए वे भूख और बदहवासी से मर जाते अगर स्थानीय लोगों ने उन्हें सहारा नहीं दिया होता। इस लिए मेरे हिसाब से इस दौर के सरताज यही लोग हैं। दूसरा नंबर मैं सेना के जवानों को दूंगा जिन्होंने उफनती कोसी की लहरों की सवारी करने का जोखिम उठाया और छतों, छप्परों, नहरों और अन्य जगहों पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे लोगों को बचाकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। जो लोग अपने घरों को छोडने के लिए तैयार नहीं थे उनतक राहत और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाई और तब तक डटे रहे जबतक पानी काबू में नहीं आने लगा। जैसा कि मैं पहले ही जिक्र कर चुका हूं, स्थानीय प्रषासन लगभग एक महीने तक सदमें की स्थिति में रहा और इस बीच में उसने जो कुछ किया उसका कोई असर नहीं रहा। स्थानीय लोगों की पहले भी लगभग दस दिन के बाद दम तोडने लगी थी। इस बीच करीब बीस दिनों तक मोरचा स्वयंसेवी संस्थाओं और फंडिंग एजेंसियों ने संभाला। नहरों-सडकों और स्कूलों-कालेजों में फैले बाढ पीडितों के लिए खाना उपलब्ध कराया। उन्हें टेंट, अनाज, कपडे, बरतन, साफ पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य जरूरी चीजें उपलब्ध कराईं। जारी

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hamara kaam

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