इनरुआ, नेपाल। वशिष्ठ कंस्ट्रक्शन कंपनी द्बारा काम पूरा हो जाने का दावा करते हुए कुसहा से बोरिया बिस्तर समेट लेने के छह दिन बाद नेपाल की एक संसदीय समिति ने तटबंध का दौरा किया। इस नेचुरल रिसोर्सेज एंड मीन्स कमेटी ने भी सर्वेक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा है कि काम अभी पूरा नहीं हुआ है। शांता चौधरी की अध्यक्षता वाली इस 13 सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पूर्वी तटबंध के प्रकाशपुर, राजा बास तथा पुलठेंगौड़ा इलाके हाई रिस्क जोन में हैं। समिति के सदस्य और पूर्व जल संसाधन मंत्री लक्ष्मण घिरमिरे ने बताया कि मानसून के दौरान कोई बड़ा हादसा हो सकता है। घिरमिरे ने कहा हमें यहां का काम देखकर तसल्ली नहीं हुई। भारतीय ठेकेदारों का काम पारदर्शी नहीं है। वहीं समिति के अध्यक्ष ने कहा है कि हमने इस बारे में भारत और नेपाल दोनों सरकारों को सूचित कर दिया है। गौरतलब है कि तटबंध के मरम्मत में जुटी वशिष्ठ कंपनी ने 1 जून को मरम्मत का काम पूरा होने की घोषणा कर दी थी, जबकि सथानीय प्रशासन के मुताबिक अभी काफी काम बचा था।
Tuesday, June 9, 2009
नेपाली संसदीय समिति ने किया कुसहा का दौरा
Posted by पुष्यमित्र at 6/09/2009 0 comments Links to this post
कोसी तटबंध की मरम्मत में हैरतअंगेज लापरवाही

काम अधूरा छोड़ लौट गई कंस्ट्रक्शन कंपनी
कोसी क्षेत्र के लाखों लोगों की जान के साथ एक बार फिर खिलवाड़ किया जा रहा है। 18 अगस्त, 2००8 को आए भीषण जल प्रलय के बाद कुसहा के पास टूटे तटबंध की मरम्मत में जुटी कंस्ट्रक्शन कंपनी वशिष्ठ अपना काम अधूरा ही छोड़कर लौट गई है। कंपनी का दावा है कि उसने तटबंध के मरम्मत का काम पूरा कर लिया है मगर मरम्मत स्थल पर काम की देखरेख करने वाले सुनसरी जिला प्रशासन अधिकारी के मुताबिक अभी काम पूरा नहीं हुआ है, लगभग 15 दिनों का काम अभी बांकी है। सुनसरी के मुख्य जिलाधिकारी हरि कृष्ण उपाध्याय बताते हैं कि हमें इस बात की जानकारी तो नहीं है कि उन्होंने काम क्यों अधूरा छोड़ दिया। मगर अपने अनुभव से यह जरूर कह सकते हैं कि अभी तटबंध के मरम्मत में कम से कम 15 दिन और लगेंगे। उन्होंने कहा कि कंपनी द्बारा इस तरह अचानक काम छोड़ देने को लेकर बिहार राज्य सरकार के जल संसाधन विभाग को कोई न कोई कदम उठाना चाहिए। जाहिर है इस बात को लेकर नेपाल में काफी चिंता है क्योंकि तटबंध टूटने की स्थिति में नेपाल की जनता सबसे पहले बाढ से प्रभावित होगी। उन्होंने कहा कि कंपनी तय समय 31 मार्च के बाद दो माह तक अपना काम पूरा नहीं कर पाई थी और इस वजह से उसे रोज नेपाल सरकार को हर्जाना चुकाना पड़ रहा था। उनके अचानक इस तरह चले जाने के पीछे यह एक वजह हो सकती है। इस बीच स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि कंपनी ने बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग को रिश्वत देकर काम पूरा होने का प्रमाणपत्र हासिल कर लिया है। बहरहाल सच्चाई जो भी हो मगर कोसी इलाके के लाखों लोग अभी पिछली त्रासदी से उबर भी नहीं पाए थे कि उनका जीवन जल संसाधन मंत्रालय की लापरवाही के कारण एक बार फिर मौत के जाल में फंसने जा रहा है।
Posted by पुष्यमित्र at 6/09/2009 0 comments Links to this post
Saturday, January 10, 2009
भूखमरी की हालत...महेंद्र ने दम तोड़ा
उस दिन के बाद से उसकी पत्नी रनिया देवी थाना, ब्लाक मुखिया, पत्रकार हर किसी के सामने रो-रोकर यह दास्तान सुनाती है. मगर कोई उसकी शिकायत दर्ज करने को तैयार नहीं. क्योंकि अगर प्रशासन यह मान लेता है कि महेंद्र शर्मा की मौत भूख से हुई तो कलेक्टर से लेकर बीडीओ तक हर अफसर की गर्दन फंसेगी. लिहाजा हर अधिकारी अपने प्रभाव से इस खबर को येन केन प्रकारेण मीडिया में कहीं आने नहीं दे रहा.
अब थोड़ी चर्चा इस बात की महेंद्र शर्मा की मौत के पीछे किस तरह अफसरशाही की कार्यप्रणाली जिम्मेवार है. छातापुर प्रखंड के लालगंज पंचायत (भरतपुर गांव इसी पंचायत में आता है) में आज तक 900 बाढ़ पीड़ित परिवारों को सरकारी राहत की पहली किश्त भी मयस्सर नहीं हुई है. वजह उन लोगों के नाम ना तो बीपीएल सूची में है और न तो एपीएल सूची में. भरतपुर में जब राहत की पहली किश्त बंट रही थी तो कई इलाकों से ऐसी समस्याएं आयीं थीं. तब सरकार ने आदेश जारी किया था कि कोई बीपीएल-एपीएल सूची मान्य नहीं होगी, हर पीड़ित को राहत मिनी चाहिए. लिहाजा कई इलाकों में वोटर लिस्ट के आधार पर बंटवारा हुआ तो कई जगह छूटे हुए लोगों से आवेदन मांगे गये. और उन्हें स्वीकार कर राहत उपलब्ध करा दी गयी. इन प्रक्रियाओं के बावजूद अधिकतर इलाकों में राहत नवंबर माह तक बांट दी गयी मगर लालगंज पंचायत के उन परिवारों को आज 10 जनवरी तक राहत की पहली किश्त भी नहीं मिल पायी है. हालांकि पांच सौ लोगों के आवेदन स्वीकृŸत हो चुके हैं पर उन्हें राहत मिली नहीं. मगर क्यों इस सवाल का जवाब कोई देने की स्थिति में नहीं है. सरकारी कर्मचारी सात जनवरी से हड़ताल पर हैं. लालगंज के पूर्व उप मुखिया रंजीत कुमार रमण बताते हैं कि यह सब अफसरों की ढिलाई के कारण हो रहा है. आपूर्ति पदाधिकारी से लेकर अनुमंडल विकास पदाधिकारी त्रिवेणीगंज तक हमेशा व्यस्त ही नजर आते हैं. हमलोगों के बार-बार गुहार लगाने के बावजूद हमेशा टाल मटोला करते रहते हैं. अभी तक एक महेंद्र मरा है यही हालत रही तो अगले 15 दिनों में इस पंचायत में कुछ और मौते हो सकती हैं.
अब दूसरा सवाल कि इंसान या तो गरीबी रेखा से उपर (एपीएल) या गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) ऐसे में एक पंचायत में 900 परिवार इस सूची से बाहर कैसे हो जाते हैं. इसका जवाब भी अफसरशाही तिकड़मबाजी में ही छूपा है. जब पंचायतों की ओर से बीपीएल सूची ब्लाक में पेश की गयी तो बीडीओ महोदय ने आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने लोग गरीब कैसे हो सकते हैं. यह फरमान जारी हुआ कि 20 प्रतिशत गांव बीपीएल सूची से काट दिये जायें. फरमान की तामिल हुई और करीब 20 प्रतिशत लोग न तो एपीएल सूची में रहे और न ही बीपीएल. उन्हीं लोगों में मृतक महेंद्र शर्मा भी हैं. भूमिहीन और रोजगारविहीन होने के बावजूद, दूसरों की जमीन में झुग्गी बना के रहने के बावजूद वह गरीब नहीं था. लिहाजा उसे वर्षों से कोई सरकारी सुविधा नहीं मिल रही थी. नरेगा के अंतर्गत उसका जॉब कार्ड भी नहीं बना. अब उसकी मौत के बावजूद मुआवजा तो दूर उसके परिवार को पारिवारिक योजना का लाभ भी नहीं मिलेगा, जिसके तहत बीपीएल परिवार के मुखिया के मौत के बाद तत्काल 10 हजार की सरकारी राहत मिलती है. इसे कहते हैं सरकारी कलम की मार. महेंद्र शर्मा और लालगंज के 900 परिवार और इस इलाके के न जाने कितने परिवार न तो गरीबी रेखा के नीचे हैं और न उपर. वे न जाने कहां हैं. बहरहाल, इसी हफ्ते हमने अखबार में बिहार सरकार की ओर से प्रकाशित पूरे पेज का विज्ञापन देखा. जिसमें मुख्यमंत्री बता रहे थे कि बाढ़ पीड़ित इलाके के लिए सरकार ने कितना कुछ किया है. संभवत: उसी दिन या एक दो दिन आगे पीछे यह खबर भी पढ़ी कि सुपौल के राघोपुर मुख्यालय में बाढ़ पीड़ितों ने खाद्य निगम के गोदाम लुटने की कोशिश की. बचाव में पुलिस को गोलियां चलानी पड़ी, पांच बाढ़ पीड़ित गिरफ्तार कर लिये गये. गिरफ्तार बाढ़ पीड़ित अपनी किसमत को सराह रहे होंगें कि चलो जेल में कम से कम खाना तो मिलेगा.
अंत में मुख्यमंत्री महोदय से एक अनुरोध है कि उनके राहत कोष में जो पैसा जमा है उससे बड़ी मात्रा में बंदुकों की गोलियां ही खरीदवा ही लें, क्योंकि बाढ़ पीड़ित तो ऐसे हैं कि इतना सब कुछ करने के बावजूद भूखे ही रह जाते हैं. गोदाम तो तोड़ने की कोशिश करते ही हैं, सरकार को बदनाम करने की कोशिश में भूखे मर भी जाते हैं.
Posted by बिहार कोसी बाढ़् at 1/10/2009 6 comments Links to this post
Labels: बाढ़ डायरी
Sunday, December 21, 2008
बालू पर फसल उगाने की जद्दोजहद
मधेपुरा जिला मुख्यालय से 16 किमी पुरब है शंकरपुर प्रखंड. इसके रायधीर पंचायत में करीब डेढ़ महीने तक पानी रहा. ऊपरी इलाका होने के कारण पानी यहां ठहरा नहीं. रायधीर बसंतपुर के बीच मुरलीगंज ब्रांच कैनाल में बसंतपुर की ओर अब भी पानी लबालब भरा हुआ है. यहां 20 अगस्त को पानी पहुंचा, लेकिन ऊपरी इलाका होने के कारण रायधीर पंचायत में 27 अगस्त को पानी घुसा. हम बढते हैं कुमारखंड ब्लाक की ओर. इस पूरे इलाके में पिछले एक पखवाडे से सूरज नहीं उग रहा. खराब मौसम ने हमारी राह और दुरुह बना दी थी. पर हमारी यात्रा अनवरत जारी रही, शायद यहां के विकट हालात लगातार हमारी तकलीफों को कम कर देती. कुमारखंड ब्लाक के टेंगराहा परिहारी पंचायत के टेंगराहा गांव की हालत हमें दुर से देखने पर दूसरे गांवों से अच्छी लगी. यहां पानी निकल चुका था. किसान अपने खेतों में काम में लगे थे. हमें खुशी हुई कि चलो अगली फसल होने के बाद इनकी हालत सुधर जायेगी. लेकिन यहां के किसानों के चेहरे से चमक गायब थी. बाढ से लडने की थकान तो थी ही, अनिश्चित भविष्य की चिंता भी इनकी आंखों में साफ पढी जा सकती थी. नदी के किनारे होने के कारण खेतों में कम से कम चार इंच तक बालू भर गया है. इन्हें खेतों से निकाल पाना संभव नहीं दिखता और ऐसी हालत में बीज बोने के बाद फसल क्या होगी, यही चिंता किसानों को खायी जा रही. फिर भी किसान कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि इसके सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं. वे इन बालू भरे खेतों में गेहूं लगा रहे हैं. लेकिन हालत यह है कि गेहूं के छोटे छोटे पौधे की पत्तियां जल रहें हैं, भूरे पडते जा रहे हैं. इन किसानों को बीज तक के लिए कोई सरकारी मदद नहीं मिल रही. इस उम्मीद पर कि कुछ तो फसल होगी यह गेहूं की रोपनी तो कर रहे हैं, लेकिन हाइबि्रड बीज का इस्तेमाल इनके बस की बात नहीं. पटवन, सिंचाई की भी इन किसानों को कोई उम्मीद नहीं. खेतों को हुए नुकसान के मुआवजे के तौर पर 4000 रुपये प्रति हेक्टेयर का मुआवजा दिया गया यानी 1600 रुपये बीघा. बाढ में किसानों की खडी फसल तबाह हो गयी. अब उन्हें और फसल होने की उम्मीद नहीं, ऐसे में यह मुआवजा उनकी कितनी मदद कर सकता है, यह सोच पाना भी भयावह है. दूसरे के खेतों में काम करने वाले मजदूरों की दास्तानटेंगराहा गांव का सूरतलाल यादव अपने चार बच्चों के साथ खेतों में जी तोड मेहनत कर रहा था. पूछने पर पता चला कि यह उसकी अपनी जमीन नहीं. बाढ के पहले उसने किसी तरह पैसे जुगाड कर 8000 रुपये लीज पर यह खेत बटैया पर लिया था. बडे अरमान के साथ उसने अधिक पैदावार की उम्मीद में धान की हाइबि्रड बीज बोयी. खाद सहित कुल उसने इन खेतों पर 4500 रुपये खचर् कर डाले. लेकिन बाढ आयी और उसकी पूरी फसल डूब गयी. वह तबाह हो गया. उसे सरकारी मुआवजा भी नहीं मिल सकता, क्योंकि सरकारी नियमों के मुताबिक जमीन के मालिक को ही मुआवजा मिल सकेगा. और जमीन के मालिक उसके साथ जाना नहीं चाहते. वह किसी तरह अपने बालू भरे खेतों में फसल बोने की कोशिश कर अपना नुकसान कम करने की कोशिश तो कर रहा है, लेकिन यह बात भी वह अच्छी तरह जानता है कि यह कोशिश जल्द ही दम तोड देगी।
Posted by बिहार कोसी बाढ़् at 12/21/2008 0 comments Links to this post
जिंदगी अब भी है बेपटरी
Posted by बिहार कोसी बाढ़् at 12/21/2008 0 comments Links to this post
Labels: बाढ़ डायरी
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