Tuesday, September 23, 2008

बेहिसाब मौतों की अनकही दास्तां

हादसों की भीषणता का अहसास हम हमेशा से मरने वालों की संख्या जानकर चलाते रहे हैं। गुजरात भूकंप में जब मरने वालों का आंकडा 25 हजार पार करने लगा तो पूरा देश दहल उठा। सुनामी के दौरान पहली बार मृतकों की संख्या लाख के पार चली गई, फिर म्यांमार में तो सारे आंकडे ही पीछे छूट गए। मगर क्या आपको मालूम है कि कोसी की धार पलटने से कितने लोग अकाल काल के गाल में समा गए । हादसे के एक माह बीत जाने के बावजूद कोई यह सही-सही बताते की स्थिति में नहीं है। रोज नावें पलट रही हैं और हैजा-डायरिया से लोग पटपटा-पटपटाकर मर रहे हैं पर सरकारी आंकडा सौ के पार नहीं गया। ( नाव पलटने और बीमारी से मरने वालों को सरकार बाढ से हुई मौतों के खाते में नहीं रखती, उनके मुताबिक यह सब तो हादसे हैं। बहुत संभव है कि जब मृतकों को मुआवजा बटने की बात उठे तो ये लोग सरकारी सूची से बाहर हों। मगर जब आप सुपौल, सहरसा, मधेपुरा के किसी चाय की दुकान पर दस हजार मौतों की बात भी कहेंगे तो लोग आपसे झगड बैठेंगे। स्थानीय लोगों के मुताबिक किसी भी हालत में यह आंकडा लाख से कम नहीं। उनके अपने तर्क हैं। कोसी की धार में आने वाले सुपौल जिले के बसंतपुर प्रखंड के बलभद्रपुर, नाढी, कुषहर, पटेरवा, बेरिया कमाल आदि गांवों के लोग किसी कैंप में नजर नहीं आते। इन गांवों में बहुत कम लोगों के बचने की उम्मीद है, क्योंकि बांध टूटने के बाद सबसे पहले पानी इन्हीं गांवों में घुसा। जब पानी इन गांवों तक पहुंचा तो लोगों को खबर तक नहीं हो पाई थी कि बांध टूट गया है। लगभग सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से करीब पंद्रह फुट उंची लहर आई थी, ऐसे में जो बचा वह संयोग से ही बचा होगा। छातापुर ब्लाक में जब पानी पहुंचा तो लोगों को खबर हो चुकी थी कि पानी आ रहा है, मगर इन इलाकों में कभी बाढ आई नहीं थी सो कई गांवों के लोग यह मानकर चल रहे थे कि इधर पानी आने का कोई तुक ही नहीं है। इस गलतफहमी में हजारों लोगों की जान ले ली। बलुआ, परियाही, राजाबारा, तिलाठी, भगवानपुर आदि ऐसे ही कुछ गांवों के नाम हैं। बलुआ की तो लगभग एक चौथाई आबादी के काल कलवित होने की आशंका जताई जा रही है। इसके बाद मधेपुरा के कुमारखंड प्रखंड का नंबर आया। सुपौल जिले में जहां कोसी नदी तीन अलग-अलग धारों गेडा, मिरचैया और सुरसर से निकली थी वहीं कुमारखंड में तीनों धार मिलकर एक हो गई और जिधर से निकली सबकुछ बहाती हुई निकली। इस धार का रास्ता कुमारखंड होकर ही था। लोग बताते हैं कि कई दिनों तक कुमारखंड में लोगों की पहली मंजिल के उपर से पानी बहता रहा। कोसी जैसे पिछडे इलाके में जहां अधिकांष लोग फूस के घरों में रहते हों वहां कोसी का यह जलवा क्या कहर बरपाया होगा यह सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। कोसी की लहरों के कहर को देखना हो तो इन दिनों देखें। बाढ का पानी उतरने के बाद कोसी अपना रास्ता दुरूस्त करने की कोषिष में मचल रही है। स्थानीय लोग बताते हैं कटनियां तो अब हो रहा है। नदी अपनी धारा के दोनो तरफ की जमीन को काट-काटकर अपने मार्ग को पुख्ता बना रही है। इस कटनियां में बडी संख्या में लोगों के घर समा रहे हैं। जब नदी का गुस्सा ठंडा होगा तो कई लोगों को यह भी पता नहीं चल पाएगा कि उनका गांव कहां हुआ करता था। मगर इन सारी बातों की फिक्र करने वाला कौन है। यह तो बेहिसाब मौतों की अनकही दास्तां है।

1 Comment:

Ajit said...

पुष्यमित्र ने जिस मुद्दे की तरफ लोगों का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश की है वह बहुत ही गम्भीर है. सरकार या सरकारी एजेंसियाँ, यहाँ तक की मीडिया भी मौत के आँकड़ों से अपनी छवि चमकाने की ही कोशिश करती हैं. इन परिस्थितियों में कोसी की प्रलय धारा के शिकार लोगों के बेहिसाब मौतों का हिसाब तो करवाना ही पड़ेगा, सरकारी बाढ़ की परिभाषा को फिर से परिभाषित करवाना ही होगा, तभी सरकार को सही मायनों में बाढ़ पीड़ितों की वास्तविक संख्या के बेहतर पुनर्वास के लिए ज़िम्मेदार बनाया जा सकता है, अन्यथा सरकार तो अपने सरकारी आँकड़ों के आधार पर काग़जों पर लोगों को पुनर्वासित कर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाएगी.

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